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रामाज्ञा प्रश्न / सप्तम सर्ग / सप्तक 4 / श्लोक 3

रामाज्ञा प्रश्न सप्तम सर्ग सप्तक 4 श्लोक 3 — कृपण की व्यर्थ देह और बिना साधन सिद्धि; सीतापति के सम्मुख विवेक से निर्णय का शकुन।

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शकुन शुभ है या अशुभ — यह निर्णय ॥रामाज्ञा प्रश्न॥ में उसी प्रसंग से होता है जो चुने हुए दोहे में वर्णित है। यह दोहा सप्तम सर्ग के चौथे सप्तक में क्रम से तीसरा है — यहाँ ध्यान, श्रद्धा और एकाग्रता पर बल दिया गया है।

बिना साधन सिद्धि — सीतापति के सम्मुख जो उचित लगे वही करो।

मूल दोहा: कृपनु देह पाइय परो, बिनु साधन सिधि होइ। सीतापति सनमुख समुझि, जो कीजिय सुभ सोइ॥३॥

शब्दार्थ:

  • कृपनु = कृपण, कंजूस
  • देह = शरीर
  • पाइय परो = पड़ा रहे
  • बिनु साधन = बिना साधन के
  • सिधि होइ = सिद्धि हो
  • सीतापति सनमुख = सीतापति के सम्मुख
  • समुझि = समझकर
  • जो कीजिय सुभ सोइ = जो शुभ लगे वही करो

कृपनु देह पाइय परो, बिनु साधन सिधि होइ = कृपण की देह पड़ी रह जाए और बिना साधन के भी सिद्धि हो। सीतापति सनमुख समुझि, जो कीजिय सुभ सोइ = सीतापति के सम्मुख समझकर जो शुभ लगे वही करो।

भावार्थ / व्याख्या:

कृपण अर्थात् कंजूस व्यक्ति का शरीर यों ही पड़ा रह जाता है — वह संग्रह करता रहता है और भोग नहीं पाता। वहीं दूसरी ओर, बिना विशेष साधन के भी सिद्धि हो सकती है।

तुलसीदास जी निर्णय की कसौटी बताते हैं — श्रीसीतापति के सम्मुख रखकर समझो, और जो शुभ लगे वही करो।

यह दोहा एक व्यावहारिक जीवन-सूत्र देता है। जब कोई निर्णय कठिन लगे, तो एक प्रश्न पूछिए — क्या यह कार्य मैं श्रीराम के सामने खड़े होकर कर सकता हूँ? यदि उत्तर हाँ है, तो वह कार्य शुभ है। शकुन की दृष्टि से यह दोहा दुविधा में स्पष्ट मार्गदर्शन देता है।

शकुन फल:

यह शकुन विवेकपूर्ण निर्णय का मार्गदर्शन देता है। निम्नलिखित प्रश्नों में:

  • किसी नैतिक दुविधा में सही-गलत का निर्णय
  • धन के संग्रह और सदुपयोग का प्रश्न
  • सीमित साधनों में बड़ा कार्य करने की स्थिति
  • कंजूसी या उदारता के बीच चुनाव
  • अंतरात्मा की आवाज़ पर भरोसा

इस दोहे के आने पर निर्णय की कसौटी स्पष्ट है — जो कार्य आप श्रीराम के सामने खड़े होकर कर सकें, वही शुभ है। संग्रह से अधिक सदुपयोग पर ध्यान दें।

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