रामायण, महाभारत, गीता, वेद तथा पुराण की कथाएं

श्रीराम की वानर सेना

रावण के गुप्तचर ने 18,00,00,00,00,00,00,000 तो सेनापतियों की संख्या बताया था, इसके अलावा असंख्य बंदर थे। ये सब वानर बल में सुग्रीव के समान हैं और इनके जैसे करोड़ों हैं, श्री रामजी की कृपा से उनमें अतुलनीय बल है। वे तीनों लोकों को तृण के समान समझते हैं

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जब ये बिलकुल पक्का हो गया कि सीता को रावण ने कैद करके लंका में ही रखा हुआ है तो आनन फानन में ही श्रीराम ने हनुमान और सुग्रीव की मदद से एक वानर सेना का गठन किया और वो लंका की ओर चल पड़े। जहाँ पर आज रामेश्वरम हैं वहां पर श्रीराम की सेना ने पड़ाव डाला। श्रीराम ने रामेश्वरम के आगे समुद्र में वह स्थान भी ढूंढ़ निकाला, जहां से काफ़ी आसानी से श्रीलंका पहुंचा जा सकता हो। इसके बाद विश्‍वकर्मा के पुत्र नल और नील की मदद से ही वानरों ने समुंद्र पर पुल बनाना शुरू कर दिया।

इस वानर सेना में इन वानरों के कई अलग अलग झुंड थे। और हर झुंड का ही एक सेनापति था। जिसे यूथपति भी कहा जाता था। यूथ अर्थात झुंड। लंका पर चढ़ाई के लिए सुग्रीव ने इन्ही वानर तथा ऋक्ष सेना का प्रबन्ध किया। बताया जाता है कि ये वानर सेना काफ़ी मेहनत से जुटाई गई थी। ये कई राज्यों के वानरों से मिलाकर बनी सेना थी।

ये सेना राम के एक कुशल प्रबंधन और संगठन का ही परिणाम थी। ये विशाल वानर सेना छोटे -छोटे राज्यों की छोटी-छोटी सेनाओं व संगठनों जैसे किष्किंधा,कोल ,भील ,रीछ और वनों में रहने वाले रहवासियों आदि का एक बेहद ही संयुक्त रूप थी।

जब भगवान राम युद्ध करने के लिए लंका पहुंचे थे उनके साथ वानरों की एक मजबूत सेना थी।
ये सेना कितनी बड़ी थी इसका वर्णन रामचरित मानस के सुन्दर कांड में मिलता है ।

ए कपि सब सुग्रीव समाना। इन्ह सम कोटिन्ह गनइ को नाना॥
राम कृपाँ अतुलित बल तिन्हहीं। तृन समान त्रैलोकहि गनहीं॥1॥

ये सब वानर बल में सुग्रीव के समान हैं और इनके जैसे (एक-दो नहीं) करोड़ों हैं, उन बहुत सो को गिन ही कौन सकता है। श्री रामजी की कृपा से उनमें अतुलनीय बल है। वे तीनों लोकों को तृण के समान (तुच्छ) समझते हैं॥1॥
रावण के गुप्तचर ने 18,00,00,00,00,00,00,000 तो सेनापतियों की संख्या बताया था, इसके अलावा असंख्य बंदर थे।

अस मैं सुना श्रवन दसकंधर। पदुम अठारह जूथप बंदर॥
नाथ कटक महँ सो कपि नाहीं। जो न तुम्हहि जीतै रन माहीं॥2॥

हे दशग्रीव! मैंने कानों से ऐसा सुना है कि अठारह पद्म तो अकेले वानरों के सेनापति हैं। हे नाथ! उस सेना में ऐसा कोई वानर नहीं है, जो आपको रण में न जीत सके॥2॥

रावण की सेना के खिलाफ यह वानर सेना काफ़ी ज्यादा बहादुरी से लड़ी। श्रीराम-रावण युद्ध में वानर सेना की एक बहुत महत्वपूर्ण भूमिका थी। श्रीराम ने यह युद्ध जीत लिया और वह इसके बाद मे अयोध्या आ गए।

रामायण के उत्तर कांड में ही उल्लेख है कि जब लंका से सुग्रीव लौटे तो उन्हें भगवान श्रीराम ने किष्किन्धा राज्य का राजा बनाया। बालि के पुत्र अंगद को वहा युवराज। इन दोनों ने मिलकर वहां पर कई सालों तक राज किया। ओर श्रीराम-रावण युद्ध में योगदान देने वाली वानर सेना भी सुग्रीव के साथ मे ही वर्षों तक रही।

हालांकि इस वानर सेना में काफ़ी अहम पदों पर रहे सभी लोग किष्किंधा में ही अहम जिम्मेदारियों में जरूर रहे। वानर सेना में भी एक महत्वपूर्ण योगदान देने वाले नल-नील कई वर्षों तक ही सुग्रीव के राज्य में मंत्री पद पर भी सुशोभित रहे तो युवराज अंगद और सुग्रीव ने मिलकर किष्किन्धा के राज्य को ओर भी बढ़ाया। गौरतलब है कि यह किष्किंधा आज भी है।

आज कहाँ है किष्किन्धा ?

यह किष्किंधा कर्नाटक में तुंगभद्रा नदी के किनारे पर स्थित है। ये बेल्लारी जिले में ही आता है जबकि विश्व प्रसिद्ध हम्पी के यह बिल्कुल बगल में ही है। इसके आसपास प्राकृतिक खूबसूरती भी बिखरी हुई है। किष्किंधा के आसपास आज भी ऐसे कई सारी गुफाएं हैं और जगह हैं, जहां पर राम और लक्ष्मण रुके हुए थे। वहीं किष्किंधा में वो गुफाएं भी हैं जहां पर वानर साम्राज्य था। इन गुफाओं में अंदर मे रहने की खूब जगह है।

सभी वानर सेना अयोध्या आई थी और राम जी के राज्याभिषेक के बाद सभी को श्रीराम ने विदा कर दिया था।

अब गृह जाहु सखा सब भजेहु मोहि दृढ़ नेम।
सदा सर्बगत सर्बहित जानि करेहु अति प्रेम ।।

हे सखागण ! अब सब लोग घर जाओ, वहां दृढ़ नियम से मुझे भजते रहना। मुझे सदा सर्वव्यापक और सबका हित करने वाला जानकर अत्यंत प्रेम करना।। ( उत्तरकांड )

“तब प्रभु भूषन बसन मंगाए। नाना रंग अनूप सुहाए।। 
सुग्रीवहि प्रथमहिं पहिराए। बसन भरत निज हाथ बनाए।।

सुग्रीव, जाम्बवन, नील, विभिषण आदि सभी को श्रीराम ने सम्मानित करके विदा कर दिया । तब अंगद जी बोले-

असरन सरन विरदु संभारी। मोहि जनि तजहु भगत हितकारी।।
मोरें प्रभु तुम गुर पितु माता। जाउं कहां तजि पद जलजाता।।

बाद में अंगद को भी भलिभांति समझा कर श्रीराम ने उन्हें भी विदा किया। रास्ते भर अंगद जी श्रीराम का बोलना, हंसना, उनकी रीति को याद करते हुए चले गए।

निषादराज गुह को भी श्रीराम ने विदा किया और अयोध्या आते रहने को कहा। हनुमान जी श्रीराम की सेवा के लिए वहीं रुक गये। इस प्रकार सभी वानर सेना अपने अपने स्थान पर चली गई और वे आज भी श्रीराम के अवतार लेने का इंतजार कर रही हैै।

महाभारत में श्री राम की वानर सेना का वर्णन

महाभारत के वनपर्व के रामोपाख्यान पर्व के अंतर्गत, अध्याय 283 में भी प्रभु श्री राम के वानर सेना के संगठन का वर्णन हुआ है।

यहाँ वैशम्पायन जी ने जनमेजय से वानर सेना के संगठन के वर्णन की कथा कही है।

मार्कण्डेय जी कहते हैं – युधिष्ठिर! तदनन्तर सुग्रीव की आज्ञा के अनुसार बड़े-बड़े वानर वीर माल्यवान पर्वत लक्ष्मण आदि के साथ बैठे हुए भगवान श्रीराम के पास पहुँचने लगे। सबसे पहले बाली के श्वसुर श्रीमान सुषेण श्रीरामचन्द्र जी की सेवा में उपस्थित हुए। उनके साथ वेगशाली वानरों की सहस्र कोटि[ सेना थी। फिर महापराक्रमी वानरराज ‘गज’ और ‘गवय’ पृथक-पृथक एक-एक अरब सेना के साथ आते दिखाई दिये। महाराज! गोलांगूल (लंगूर) जाति के वानर गवाक्ष, जो देखने में बड़ा भयंकर था, साठ सहस्र कोटि (छः अरब) वानर सेना साथ लिये दृष्टिगोचर हुआ। गन्धमादन पर्वत पर रहने वाला गन्धमादन नाम से विख्यात वानर वानरों की दस खरब सेना साथ लेकर आया। पनस नामक बुद्धिमान तथा महाबली वानर सत्तावन करोड़ सेना साथ लेका आया।

वानरों में वृद्ध तथा अत्यन्त पराक्रमी श्रीमान दधिमुख भयंकर तेज से सम्पन्न वानरों की विशाल सेना साथ लेकर आये। जिनके मुख (ललाट) पर तिलक का चिह्न शोभा पा रहा था तथा जो भयंकर पराक्रम करने वाले थे, ऐसे काले रंग के शतकोटि सहस्र (दस अरब) रीछों की सेना के साथ वहाँ जाम्बवान दिखायी दिये। महाराज! ये तथा और भी बहुत से वानरयूथ पतियों के भी यूथपति, जिनकी कोई संख्या नहीं थी, श्रीरामचन्द्रजी के कार्य से वहाँ एकत्र हुए। उनके अंग पर्वतों के शिखर के सदृश जान पड़ते थे। वे सबके सब सिंहों के समान गरजते और इधर-उधर दौड़ते थे। उन सबका सम्मिलित शब्द बड़ा भयंकर प्रतीत होता था। कोई पर्वत-शिखर के समान ऊँचे थे, तो कोई भैंसों के सदृश मोटे और काले। कितने ही वानर शरद ऋतु के बादलों की तरह सफेद दिखायी देते थे, कितनों के ही मुख सिंदूर के समान लाल रंग के थे।

राम आदि का युद्ध के लिए प्रस्थान

वे वानर सैनिक उछलते, गिरते-पड़ते, कूदते-फाँदते और धूल उड़ाते हुए चारों ओर से एकत्र हो रहे थे। वानरों की वह विशाल सेना भरे-पूरे महासागर के समान दिखायी देती थी। सुग्रीव की आज्ञा से उस समय माल्यवान पर्वत के आस-पास ही उस समसत सेना का पड़ाव पडत्र गया। तदनन्तर उन समस्त श्रेष्ठ वानरों के सब ओर से एकत्र हो जाने पर सुग्रीव सहित भगवान श्रीराम ने एक दिन शुभ तिथि, उत्तम नक्षत्र और शुभ मुहुर्त में युद्ध के लिये प्रस्थान किया। उस समय ऐसा जान पड़ता था मानो वे उस व्यूह-रचना युक्त सेना के द्वारा सम्पूर्ण लोकों का संहार करने जा रहे हैं। उस सेना के मुहाने पर वायुपुत्र हनुमान जी विराजमान थे। किसी से भी भय न मानने वाले सुमित्रानन्दन लक्ष्मण उसके पृष्ठभाग की रक्षा कर रहे थे। दोनों रघुवंशी वीर श्रीराम और लक्ष्मण हाथों में गोह के चमड़े के बने हुए दस्ताने पहने हुए थे। वे ग्रहों से घिरे हुए चन्द्रमा और सूर्य की भाँति वानर जातीय मन्त्रियों के बीच में होकर चल रहे थे। श्रीरामचन्द्र जी के सम्मुख साल, ताल और शिलारूपी आयुध लिये वे समसत वानर सैनिक सूर्योदय के समय पके हुए धान के विशाल खेतों के समान जान पड़ते थे।

वानरसेना का आगे बढ़ना

नल, नील, अंगद, क्राथ, मैन्द तथा द्विविद के द्वारा सुरक्षित हुई वह विशाल वानरसेना श्रीरामचन्द्र जी का कार्य सिद्ध करने के लिये आगे बढ़ती जा रही थी। जहाँ फल-मूल की बहुतायत होती, मधु और कन्द-मूल प्रचुर मात्रा में उपलब्ध होते तथा जल की अधिक सुविधा होती, ऐसे कल्याणकारी और उत्तम विविध पर्वतीय शिखरों पर डेरा डालती हुई वह वानर सेना बिना किसी विघ्न-बाधा के खारे पानी के समुद्र के निकट जा पहुँची। असंख्य ध्वजा-पताकाओं से सुशोभित वह विशाल वाहिनी दूसरे महासागर के समान जान पड़ती थी। सागर के तटवर्ती वन में पहुँचकर उसने अपना पड़ाव डाला।

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