रामाज्ञा प्रश्न / सप्तम सर्ग / सप्तक 4 / श्लोक 4
रामाज्ञा प्रश्न सप्तम सर्ग सप्तक 4 श्लोक 4 — आरंभ और परिणाम में हित पर बीच में बाधा; संकोच सहित कहे जाने वाला मिश्रित शकुन।
सात सर्ग, प्रत्येक सर्ग में सात सप्तक और प्रत्येक सप्तक में सात दोहे — यही ॥रामाज्ञा प्रश्न॥ की सरल किंतु सुगठित संरचना है। यह दोहा सप्तम सर्ग के चौथे सप्तक में क्रम से चौथा है — यहाँ ध्यान, श्रद्धा और एकाग्रता पर बल दिया गया है।
पहले हित, बीच में बाधा — शकुन संकोच सहित कहना चाहिए।
मूल दोहा: पहिले हित परिनाम गत, बीच बीच मल पोच। सगुन कहब अस राम गति, कहबि समेत संकोच॥४॥
शब्दार्थ:
- पहिले हित = आरंभ में हित
- परिनाम गत = परिणाम की स्थिति
- बीच बीच = बीच-बीच में
- मल पोच = मलिनता और हीनता
- सगुन कहब = शकुन कहना
- अस राम गति = ऐसी श्रीराम की गति है
- कहबि = कहना चाहिए
- समेत संकोच = संकोच सहित
पहिले हित परिनाम गत, बीच बीच मल पोच = आरंभ और परिणाम में हित, पर बीच-बीच में मलिनता और बाधा। कहबि समेत संकोच = यह शकुन संकोच सहित कहना चाहिए।
भावार्थ / व्याख्या:
इस दोहे में मिश्रित फल का वर्णन है — आरंभ में हित है, परिणाम भी ठीक है, परंतु बीच-बीच में मलिनता और बाधाएँ आएँगी।
तुलसीदास जी कहते हैं कि ऐसी श्रीराम की गति है और यह शकुन संकोच सहित कहना चाहिए, अर्थात् पूरे आत्मविश्वास से नहीं।
यह दोहा शकुन-वक्ता के लिए भी एक शिक्षा है — जब स्थिति मिश्रित हो तो अति-आश्वासन नहीं देना चाहिए। शकुन की दृष्टि से इसका व्यावहारिक अर्थ है — कार्य होगा, पर मार्ग सरल नहीं होगा। बीच में कठिनाइयाँ आएँगी, इसलिए धैर्य और वैकल्पिक योजना दोनों रखें।
शकुन फल:
यह शकुन मिश्रित फल का सूचक है — आरंभ और अंत ठीक, बीच में बाधा। निम्नलिखित प्रश्नों में:
- लंबा चलने वाला कार्य या परियोजना
- ऐसा मार्ग जिसमें बीच में कठिनाई आए
- धैर्य की परीक्षा लेने वाली स्थिति
- जहाँ वैकल्पिक योजना आवश्यक हो
- परिणाम को लेकर आंशिक संशय
इस दोहे के आने पर कार्य तो होगा, पर मार्ग सरल नहीं होगा। बीच की कठिनाइयों के लिए तैयार रहें और वैकल्पिक योजना अवश्य रखें।
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