रामाज्ञा प्रश्न / सप्तम सर्ग / सप्तक 7 / श्लोक 6
रामाज्ञा प्रश्न सप्तम सर्ग सप्तक 7 श्लोक 6 — कार्य के अनुरूप दोहा आने पर शकुन-समय सत्य; श्रीराम की गति गोपनीय बताने वाला दोहा।
॥रामाज्ञा प्रश्न॥ के कुल ३४३ दोहे सात सर्गों में इस प्रकार बँटे हैं कि हर सर्ग में ४९ दोहे आते हैं। सप्तम सर्ग, सातवें सप्तक और उसमें छठा दोहा — यह सर्ग पूरे ग्रंथ के प्रयोग की कुंजी माना जाता है।
जो दोहा प्रश्न के अनुरूप आए — वही शकुन सत्य है।
मूल दोहा: जो जेहि काजहिं अनुहरइ, सो दोहा जब होइ। सगुन समय सब सत्य सब, कहब राम गति गोइ॥६॥
शब्दार्थ:
- जो जेहि काजहिं = जो जिस कार्य के
- अनुहरइ = अनुरूप हो
- सो दोहा = वही दोहा
- जब होइ = जब आए
- सगुन समय = शकुन और समय
- सब सत्य सब = सब सत्य हैं
- कहब = कहना
- राम गति गोइ = श्रीराम की गति गोपनीय है
जो जेहि काजहिं अनुहरइ, सो दोहा जब होइ = जो दोहा जिस कार्य के अनुरूप हो और वही आ जाए। सगुन समय सब सत्य सब, कहब राम गति गोइ = तब शकुन और समय सब सत्य समझो — श्रीराम की गति गोपनीय है।
भावार्थ / व्याख्या:
जो दोहा जिस कार्य के अनुरूप हो और गणना करने पर वही दोहा आ जाए, तब समझो कि शकुन और समय दोनों सत्य हैं।
अंतिम पंक्ति में तुलसीदास जी एक गहरी बात कहते हैं — ‘राम गति गोइ’, अर्थात् श्रीराम की गति गोपनीय और अगम्य है।
यह विनम्रता का उदाहरण है। पूरा ग्रंथ लिखने के बाद भी वे यह नहीं कहते कि सब कुछ समझ में आ गया। भगवान की लीला रहस्यमय है — हम केवल संकेत पढ़ सकते हैं, पूरा रहस्य नहीं जान सकते। शकुन की दृष्टि से यह दोहा बताता है कि जो उत्तर मिला है उस पर विश्वास करें, परंतु अहंकार न करें।
शकुन फल:
यह शकुन सत्य है, पर श्रीराम की गति गोपनीय है। निम्नलिखित प्रश्नों में:
- मिले हुए उत्तर या संकेत पर विश्वास
- किसी संयोग को सार्थक मानना
- अपनी समझ की सीमा स्वीकार करना
- भविष्य के रहस्य से जुड़ा प्रश्न
- विनम्रता और श्रद्धा का भाव
इस दोहे के आने पर जो उत्तर मिला है उस पर विश्वास करें, परंतु स्मरण रखें — श्रीराम की गति गोपनीय है। संकेत पढ़िए, अहंकार मत कीजिए।
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