रामाज्ञा प्रश्न / सप्तम सर्ग / सप्तक 4 / श्लोक 2
रामाज्ञा प्रश्न सप्तम सर्ग सप्तक 4 श्लोक 2 — हितैषी से विरोध और अहितकारी से प्रेम; राम-विमुखता और भरपूर अभाग्य का शकुन।
॥रामाज्ञा प्रश्न॥ तुलसीदास जी की उन रचनाओं में गिना जाता है जो भक्ति के साथ-साथ व्यावहारिक मार्गदर्शन भी देती हैं। यह दोहा सप्तम सर्ग के चौथे सप्तक में क्रम से दूसरा है — यहाँ ध्यान, श्रद्धा और एकाग्रता पर बल दिया गया है।
हितैषी से विरोध और अहितकारी से प्रेम — भरपूर अभाग्य का शकुन।
मूल दोहा: हित पर बढ़इ बिरोधु जब, अनहित पर अनुराग। राम बिमुख बिधि बाम गत, सगुन अघाइ अभाग॥२॥
शब्दार्थ:
- हित पर = हितैषी पर
- बढ़इ बिरोधु = विरोध बढ़े
- अनहित पर = अहितकारी पर
- अनुराग = प्रेम
- राम बिमुख = श्रीराम से विमुख
- बिधि बाम = विधाता प्रतिकूल
- गत = स्थिति
- सगुन अघाइ अभाग = भरपूर अभाग्य का शकुन
हित पर बढ़इ बिरोधु जब, अनहित पर अनुराग = जब हितैषी से विरोध बढ़े और अहितकारी से प्रेम हो। राम बिमुख बिधि बाम गत, सगुन अघाइ अभाग = तब समझो राम से विमुखता है, विधाता प्रतिकूल है — यह भरपूर अभाग्य का शकुन है।
भावार्थ / व्याख्या:
जब हितैषी लोगों से विरोध बढ़ने लगे और अहित करने वालों से प्रेम होने लगे, तब समझना चाहिए कि व्यक्ति श्रीराम से विमुख हो गया है और विधाता प्रतिकूल है — यह भरपूर अभाग्य का शकुन है।
यह दोहा अत्यंत सूक्ष्म मनोवैज्ञानिक अवलोकन है। बुरे समय का सबसे पहला लक्षण बाहरी हानि नहीं, बल्कि विवेक का नष्ट होना है — अपने पराए लगने लगते हैं और पराए अपने।
शकुन की दृष्टि से यह दोहा गंभीर चेतावनी है। इसका व्यावहारिक संदेश यह है — यदि आप अपने शुभचिंतकों से दूर हो रहे हैं और नए लोगों पर अधिक भरोसा कर रहे हैं, तो रुककर आत्म-निरीक्षण करें।
शकुन फल:
यह शकुन भरपूर अभाग्य का सूचक है। निम्नलिखित प्रश्नों में गंभीर चेतावनी:
- शुभचिंतकों या पुराने मित्रों से बढ़ती दूरी
- नए लोगों पर अत्यधिक भरोसा
- परिवार या पुराने साथियों से मतभेद
- विवेक और निर्णय-क्षमता का कमज़ोर होना
- किसी की सलाह ठुकराकर लिया जा रहा निर्णय
इस दोहे के आने पर गंभीर चेतावनी है। यदि अपने शुभचिंतकों से दूरी बढ़ रही है तो तुरंत रुकें। अपने पुराने हितैषियों से पुनः जुड़ें — यही मार्ग है।
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