रामाज्ञा प्रश्न / सप्तम सर्ग / सप्तक 2 / श्लोक 7
रामाज्ञा प्रश्न सप्तम सर्ग सप्तक 2 श्लोक 7 — खेती, विद्या, व्यापार, सेवा और शिल्प सब रामराज्य में कल्पवृक्ष समान सफल; शुभ शकुन।
॥रामाज्ञा प्रश्न॥ पढ़ते समय दोहे का अर्थ और उसका शकुन-फल — दोनों को साथ रखकर विचार करना उचित माना गया है। प्रस्तुत दोहा सप्तम सर्ग के दूसरे सप्तक में सातवाँ स्थान पर है, जहाँ प्रश्न पूछने की सही रीति समझाई गई है।
सप्तक का समापन — रामराज्य में हर वृत्ति कल्पवृक्ष के समान फलती है।
मूल दोहा: खेती बनि बिद्या बनिज, सेवा सिलिप सुकाज। तुलसी सुरतरु सरिस सब, सुफल राम के राज॥७॥
शब्दार्थ:
- खेती = कृषि
- बनि = मज़दूरी, वृत्ति
- बिद्या = विद्या, शिक्षा
- बनिज = व्यापार
- सेवा = नौकरी, सेवा
- सिलिप = शिल्प, कारीगरी
- सुकाज = उत्तम कार्य
- सुरतरु सरिस = कल्पवृक्ष के समान
- सुफल = सफल
खेती बनि बिद्या बनिज, सेवा सिलिप सुकाज = खेती, वृत्ति, विद्या, व्यापार, सेवा और शिल्प — सब उत्तम कार्य हैं। तुलसी सुरतरु सरिस सब, सुफल राम के राज = रामराज्य में सब कल्पवृक्ष के समान सफल होते हैं।
भावार्थ / व्याख्या:
खेती, वृत्ति, विद्या, व्यापार, सेवा तथा शिल्प — ये सब उत्तम कार्य हैं। तुलसीदास जी कहते हैं कि श्रीराम के राज्य में ये सब कल्पवृक्ष के समान सफल होते हैं।
इस दोहे में छह प्रमुख वृत्तियाँ गिनाई गई हैं, जो समाज की पूरी अर्थव्यवस्था को समेटती हैं — कृषि, श्रम, शिक्षा, वाणिज्य, सेवा और शिल्प।
मूल संदेश यह है कि कोई भी वृत्ति छोटी या बड़ी नहीं है। जहाँ न्याय और धर्म हो, वहाँ हर काम फलता है। शकुन की दृष्टि से यह दोहा सभी प्रकार के जीविका-संबंधी प्रश्नों में अनुकूल उत्तर देता है।
शकुन फल:
यह शकुन बताता है कि हर वृत्ति कल्पवृक्ष समान फलेगी। निम्नलिखित प्रश्नों में:
- खेती, कृषि या भूमि से जीविका
- नौकरी, सेवा या वेतनभोगी कार्य
- व्यापार, दुकान या वाणिज्य
- विद्या, शिक्षण या ज्ञान-आधारित कार्य
- शिल्प, कारीगरी या हस्तकला
इस दोहे के आने पर आपकी वृत्ति कल्पवृक्ष के समान फलेगी। कोई भी काम छोटा नहीं — ईमानदारी से करें, फल अवश्य मिलेगा।
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