रामाज्ञा प्रश्न / सप्तम सर्ग / सप्तक 3 / श्लोक 1
रामाज्ञा प्रश्न सप्तम सर्ग सप्तक 3 श्लोक 1 — अमृत, साधु, कल्पवृक्ष, पुष्प, फल, मधुर वाणी और सीतापति-भक्ति; सात सुमंगलों का शकुन।
गोस्वामी तुलसीदास जी रचित ॥रामाज्ञा प्रश्न॥ सात सर्गों का ग्रंथ है, जिसका प्रत्येक सर्ग सात सप्तकों में और प्रत्येक सप्तक सात दोहों में बँटा हुआ है। सप्तम सर्ग के तीसरे सप्तक का यह पहला दोहा है; इस सर्ग में दिन, वार और मुहूर्त के अनुसार फल का विचार मिलता है।
सप्तक 3 का आरंभ — सीतापति की भक्ति सात सुमंगलों की सूचक।
मूल दोहा: सुधा साधु सुरतरु सुमन, सुफल सुहावनि बात। तुलसी सीतापति भगति, सगुन सुमंगल सात॥१॥
शब्दार्थ:
- सुधा = अमृत
- साधु = सत्पुरुष
- सुरतरु = कल्पवृक्ष
- सुमन = पुष्प
- सुफल = उत्तम फल
- सुहावनि बात = सुहावनी बात
- सीतापति भगति = सीतापति श्रीराम की भक्ति
- सुमंगल सात = सात सुमंगल
सुधा साधु सुरतरु सुमन, सुफल सुहावनि बात = अमृत, साधु, कल्पवृक्ष, पुष्प, उत्तम फल और सुहावनी बात। तुलसी सीतापति भगति, सगुन सुमंगल सात = सीतापति की भक्ति — ये सात सुमंगल हैं।
भावार्थ / व्याख्या:
अमृत, साधु, कल्पवृक्ष, पुष्प, उत्तम फल, सुहावनी बात और श्रीसीतापति की भक्ति — तुलसीदास जी इन सातों को सुमंगल का शकुन बताते हैं।
इस दोहे में ‘स’ अक्षर की सुंदर आवृत्ति है और सातों वस्तुएँ ऐसी हैं जो देने वाली हैं, लेने वाली नहीं — अमृत जीवन देता है, साधु मार्ग देता है, कल्पवृक्ष इच्छा पूरी करता है, पुष्प सुगंध देता है, फल पोषण देता है, मधुर वचन शांति देता है और भक्ति सब कुछ देती है।
शकुन की दृष्टि से यह दोहा अत्यंत शुभ है। सप्तम सर्ग के इस सप्तक में तुलसीदास जी शकुन-विचार से आगे बढ़कर बताते हैं कि किन-किन बातों का दिखना या मिलना स्वयं में शुभ शकुन है।
शकुन फल:
ये सातों वस्तुएँ सुमंगल का शकुन हैं। निम्नलिखित प्रश्नों में परिणाम अनुकूल:
- किसी साधु, संत या सत्पुरुष से भेंट
- मधुर बातचीत या सुखद समाचार
- औषधि, फल या पौष्टिक वस्तु का लाभ
- भक्ति और आध्यात्मिक साधना
- कोई भी मंगल कार्य या शुभ आरंभ
इस दोहे के आने पर सुमंगल का शकुन है। सत्संग, मधुर वाणी और भक्ति — तीनों बनाए रखें, यही सबसे बड़ा शुभ है।
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