रामाज्ञा प्रश्न / षष्ठम सर्ग / सप्तक 6 / श्लोक 7
रामाज्ञा प्रश्न षष्ठम सर्ग सप्तक 6 श्लोक 7 — श्रीराम द्वारा अगणित अश्वमेध यज्ञ और अनेक प्रकार के दान; श्रेष्ठ मंगलों की परंपरा का शकुन।
॥रामाज्ञा प्रश्न॥ पढ़ते समय दोहे का अर्थ और उसका शकुन-फल — दोनों को साथ रखकर विचार करना उचित माना गया है। इस छठे सप्तक के सातवाँ दोहे में षष्ठम सर्ग का वह भाव है जहाँ हर्ष के साथ-साथ वियोग की छाया भी दिखाई देती है।
अगणित अश्वमेध यज्ञ और दान — श्रेष्ठ मंगलों की परंपरा।
मूल दोहा: बाजिमेध अगनित किए, दिए दान बहु भाँति। तुलसी राजा राम जग सगुन सुमंगल पाँति॥७॥
शब्दार्थ:
- बाजिमेध = अश्वमेध यज्ञ
- अगनित = अगणित, अनगिनत
- किए = किए
- दिए दान = दान दिए
- बहु भाँति = अनेक प्रकार से
- राजा राम = राजा श्रीराम
- जग = संसार में
- सुमंगल पाँति = मंगलों की परंपरा
बाजिमेध अगनित किए, दिए दान बहु भाँति = अगणित अश्वमेध यज्ञ किए और अनेक प्रकार से दान दिए। सगुन सुमंगल पाँति = यह श्रेष्ठ मंगलों की परंपरा का द्योतक है।
भावार्थ / व्याख्या:
तुलसीदास जी कहते हैं कि महाराज श्रीराम ने अगणित अश्वमेध यज्ञ किए और अनेक प्रकार से दान दिए। संसार में यह शकुन श्रेष्ठ मंगलों की परंपरा का द्योतक है।
अश्वमेध यज्ञ सार्वभौम सत्ता का प्रतीक था, परंतु उसके साथ दान का उल्लेख इसे विशेष बनाता है। शक्ति और उदारता का यह संयोग दुर्लभ है।
‘सुमंगल पाँति’ अर्थात् मंगलों की पंक्ति या परंपरा — यह एक बार का मंगल नहीं, निरंतर चलने वाली शृंखला है। शकुन की दृष्टि से यह दोहा उन प्रश्नों में विशेष अनुकूल है जहाँ बड़े आयोजन, दान या दीर्घकालिक शुभ कार्य विषय हो।
शकुन फल:
यह शकुन श्रेष्ठ मंगलों की परंपरा का द्योतक है। निम्नलिखित प्रश्नों में:
- यज्ञ, अनुष्ठान या बड़े धार्मिक आयोजन
- दान, सेवा और परोपकार का कार्य
- लगातार चलने वाले शुभ अवसर
- शक्ति और उदारता का संयोग
- दीर्घकालिक प्रतिष्ठा और सुयश
इस दोहे के आने पर मंगलों की परंपरा का संकेत है। यज्ञ, दान और सेवा का कोई कार्य आरंभ करें — शुभता की शृंखला चलेगी।
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