रामाज्ञा प्रश्न / षष्ठम सर्ग / सप्तक 6 / श्लोक 6
रामाज्ञा प्रश्न षष्ठम सर्ग सप्तक 6 श्लोक 6 — वर्ण-धर्म और आश्रम-धर्म में निरत सुखी प्रजा; यज्ञ, जप और योग सफल होने का मंगल शकुन।
तुलसीदास जी की यह कृति प्रश्न और उत्तर की उस प्राचीन पद्धति को जीवित रखती है जिसमें रामकथा ही प्रमाण है। इस छठे सप्तक के छठा दोहे में षष्ठम सर्ग का वह भाव है जहाँ हर्ष के साथ-साथ वियोग की छाया भी दिखाई देती है।
वर्ण-धर्म और आश्रम-धर्म में निरत सुखी लोग — यज्ञ, जप और योग सफल।
मूल दोहा: बरन धरम आश्रम धरम निरत सुखी सब लोग। राम राज मंगल सगुन, सुफल जाग जप जोग॥६॥
शब्दार्थ:
- बरन धरम = वर्ण-धर्म
- आश्रम धरम = आश्रम-धर्म
- निरत = लगे हुए
- सुखी सब लोग = सब लोग सुखी
- मंगल सगुन = मंगलसूचक शकुन
- सुफल = सफल
- जाग जप जोग = यज्ञ, जप और योग
बरन धरम आश्रम धरम निरत सुखी सब लोग = सब लोग अपने वर्ण-धर्म और आश्रम-धर्म में लगे हुए सुखी हैं। सुफल जाग जप जोग = यज्ञ, जप और योग सफल होगा।
भावार्थ / व्याख्या:
श्रीराम के राज्य में सब लोग अपने वर्ण-धर्म और आश्रम-धर्म में लगे हुए हैं, इसीलिए सुखी हैं।
इस दोहे का मूल संदेश यह है कि जब हर व्यक्ति अपना नियत कर्तव्य निभाता है, तब समाज में स्वाभाविक रूप से सुख और व्यवस्था आ जाती है।
तुलसीदास जी कहते हैं कि यह शकुन मंगलसूचक है और यज्ञ, जप तथा योग सफल होंगे। शकुन की दृष्टि से यह दोहा उन प्रश्नों में विशेष अनुकूल है जहाँ अपने कर्तव्य, भूमिका या साधना का प्रश्न हो।
शकुन फल:
यह शकुन मंगलसूचक है और यज्ञ-जप-योग की सफलता का सूचक है। निम्नलिखित प्रश्नों में:
- यज्ञ, जप, योग या साधना का फल
- अपने कर्तव्य या भूमिका का निर्वाह
- जीवन के वर्तमान चरण के अनुसार निर्णय
- अनुशासित दिनचर्या और नियम-पालन
- संस्था या समाज में व्यवस्था और अनुशासन
इस दोहे के आने पर शकुन मंगलसूचक है। अपने कर्तव्य पर टिके रहें — यज्ञ, जप और योग सभी सफल होंगे।
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