रामाज्ञा प्रश्न / चतुर्थ सर्ग / सप्तक 6 / श्लोक 1
रामाज्ञा प्रश्न चतुर्थ सर्ग सप्तक 6 श्लोक 1 — मार्ग के लोगों को यज्ञ-जप-योग से अगम्य राम-दर्शन का सौभाग्य; श्रेष्ठ प्रश्न-फल।
इस ग्रंथ में उत्तर सीधा नहीं, प्रसंग के माध्यम से मिलता है — जो प्रसंग सामने आए, उसी का भाव प्रश्न का फल बन जाता है। इस छठे सप्तक के पहला दोहे में चतुर्थ सर्ग की वही शुभ धारा है जो हर मनोरथ की पूर्ति का भरोसा देती है।
मार्ग के लोगों को श्रीराम-दर्शन का सौभाग्य — प्रश्न-फल श्रेष्ठ है।
मूल दोहा: लेत बिलोचन लाभु सब बड़भागी मग लोग। राम कृपाँ दरसनु सुगम, अगम जाग जप जोग॥१॥
शब्दार्थ:
- बिलोचन लाभु = नेत्रों का लाभ
- बड़भागी = बड़े भाग्यशाली
- मग लोग = मार्ग के लोग
- राम कृपाँ = श्रीराम की कृपा से
- दरसनु सुगम = दर्शन सुलभ
- अगम = अगम्य, कठिन
- जाग जप जोग = यज्ञ, जप और योग
लेत बिलोचन लाभु सब बड़भागी मग लोग = मार्ग के भाग्यशाली लोग नेत्रों का लाभ पा रहे हैं। अगम जाग जप जोग = जो दर्शन यज्ञ, जप और योग से भी अगम्य है।
भावार्थ / व्याख्या:
मार्ग के सब लोग बड़े भाग्यशाली हैं — वे नेत्रों का लाभ अर्थात् श्रीराम का दर्शन पा रहे हैं। यह वही दर्शन है जो यज्ञ, जप तथा योग से भी अगम्य है, परंतु श्रीराम की कृपा से सुगम हो जाता है।
इस दोहे में एक गहरी बात है — जो वस्तु कठिन साधना से नहीं मिलती, वह कृपा से सहज मिल जाती है। मार्ग के साधारण लोगों ने कोई तपस्या नहीं की थी, फिर भी उन्हें वह मिला जो योगियों को दुर्लभ है।
तुलसीदास जी इस प्रश्न-फल को ‘श्रेष्ठ’ कहते हैं। शकुन की दृष्टि से यह दोहा उन प्रश्नों में अत्यंत अनुकूल है जहाँ कोई दुर्लभ अवसर, कृपा या अप्रत्याशित सौभाग्य विषय हो।
शकुन फल:
यह प्रश्न-फल श्रेष्ठ है। निम्नलिखित प्रश्नों में परिणाम अत्यंत अनुकूल:
- कोई दुर्लभ अवसर या अप्रत्याशित सौभाग्य
- बिना विशेष प्रयत्न के मिलने वाला लाभ
- किसी बड़े व्यक्ति का सान्निध्य या कृपा
- सही समय पर सही जगह होने का लाभ
- भाग्य और कृपा से जुड़ा कोई प्रश्न
इस दोहे के आने पर प्रश्न-फल श्रेष्ठ है। जो कठिन प्रयत्न से नहीं मिलता, वह कृपा से सहज मिलेगा। यह अवसर व्यर्थ न जाने दें।
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