रामाज्ञा प्रश्न / चतुर्थ सर्ग / सप्तक 6 / श्लोक 2
रामाज्ञा प्रश्न चतुर्थ सर्ग सप्तक 6 श्लोक 2 — बादलों की छाया, कोमल भूमि और अनुकूल वायु; परिस्थितियों के अनुकूल होने का शुभ शकुन।
॥रामाज्ञा प्रश्न॥ तुलसीदास जी की उन रचनाओं में गिना जाता है जो भक्ति के साथ-साथ व्यावहारिक मार्गदर्शन भी देती हैं। इस छठे सप्तक के दूसरा दोहे में चतुर्थ सर्ग की वही शुभ धारा है जो हर मनोरथ की पूर्ति का भरोसा देती है।
प्रकृति का अनुकूल हो जाना — प्रश्न-फल शुभ है।
मूल दोहा: जलद छाँह मृदु मग अवनि सुखद पवन अनुकूल। हरषत बिबुध बिलोकि प्रभु बरषत सुरतरु फूल॥२॥
शब्दार्थ:
- जलद = बादल
- छाँह = छाया
- मृदु = कोमल
- मग अवनि = मार्ग की भूमि
- सुखद पवन = सुखदायी वायु
- अनुकूल = अनुकूल
- बिबुध = देवता
- बिलोकि = देखकर
- सुरतरु फूल = कल्पवृक्ष के पुष्प
जलद छाँह मृदु मग अवनि = बादल छाया कर रहे हैं और मार्ग की भूमि कोमल है। बरषत सुरतरु फूल = देवता कल्पवृक्ष के पुष्पों की वर्षा कर रहे हैं।
भावार्थ / व्याख्या:
बादल छाया कर रहे हैं, मार्ग की भूमि कोमल हो गई है और सुखदायी अनुकूल वायु चल रही है। प्रभु को देखकर देवता प्रसन्न हो रहे हैं और कल्पवृक्ष के पुष्पों की वर्षा कर रहे हैं।
इस दोहे में प्रकृति स्वयं यात्रा को सुगम बना रही है। धूप से बचाने के लिए बादल, पैरों के लिए कोमल भूमि, और शीतल वायु।
तुलसीदास जी इस प्रश्न-फल को शुभ कहते हैं। शकुन की दृष्टि से यह दोहा उन प्रश्नों में विशेष अनुकूल है जहाँ बाहरी परिस्थितियाँ, मौसम या वातावरण प्रश्न का विषय हो। यह बताता है कि परिस्थितियाँ आपके अनुकूल बनेंगी।
शकुन फल:
यह प्रश्न-फल शुभ है। निम्नलिखित प्रश्नों में परिणाम अनुकूल रहेगा:
- यात्रा और मार्ग की सुगमता
- मौसम या बाहरी परिस्थिति पर निर्भर कार्य
- किसी कठिन कार्य में मिलने वाली सुविधा
- अनुकूल वातावरण और सहयोग
- बाधाओं का स्वतः दूर हो जाना
इस दोहे के आने पर प्रश्न-फल शुभ है। परिस्थितियाँ स्वयं आपके अनुकूल बनेंगी। जो मार्ग कठिन लग रहा था, वह सुगम हो जाएगा।
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