रामाज्ञा प्रश्न / चतुर्थ सर्ग / सप्तक 6 / श्लोक 3
रामाज्ञा प्रश्न चतुर्थ सर्ग सप्तक 6 श्लोक 3 — राक्षसों का नाश, यज्ञ-रक्षा और विश्वामित्रजी का विद्या-दान; उत्तम प्रश्न-फल।
शकुन शुभ है या अशुभ — यह निर्णय ॥रामाज्ञा प्रश्न॥ में उसी प्रसंग से होता है जो चुने हुए दोहे में वर्णित है। इस छठे सप्तक के तीसरा दोहे में चतुर्थ सर्ग की वही शुभ धारा है जो हर मनोरथ की पूर्ति का भरोसा देती है।
यज्ञ-रक्षा और विश्वामित्रजी का विद्या-दान — प्रश्न-फल उत्तम है।
मूल दोहा: दले मलिन खल राखि मख, मुनि सिष आसिष दीन्ह। बिद्या बिस्वामित्र सब सुथल समरपित कीन्हि॥३॥
शब्दार्थ:
- दले = नष्ट किया
- मलिन खल = दुष्ट राक्षस
- राखि मख = यज्ञ की रक्षा करके
- सिष = शिक्षा
- आसिष = आशीर्वाद
- बिद्या = विद्याएँ
- सुथल = पुण्यस्थल
- समरपित कीन्हि = दान कर दीं
दले मलिन खल राखि मख = दुष्टों को नष्ट कर यज्ञ की रक्षा की। बिद्या बिस्वामित्र सब सुथल समरपित कीन्हि = विश्वामित्रजी ने पुण्यस्थल में सारी विद्याएँ दान कीं।
भावार्थ / व्याख्या:
प्रभु ने दुष्ट राक्षसों को नष्ट कर दिया और इस प्रकार यज्ञ की रक्षा की। मुनि विश्वामित्रजी ने उन्हें शिक्षा और आशीर्वाद दिया तथा पुण्यस्थल में सारी विद्याएँ दान कीं।
यहाँ एक सुंदर आदान-प्रदान है। श्रीराम ने सेवा दी और मुनि ने विद्या दी। विश्वामित्रजी ने बला और अतिबला जैसी दिव्य विद्याएँ उन्हें सिखाईं।
तुलसीदास जी इस प्रश्न-फल को ‘उत्तम’ कहते हैं। शकुन की दृष्टि से यह दोहा उन प्रश्नों में विशेष अनुकूल है जहाँ सेवा के बदले ज्ञान, प्रशिक्षण या विशेष कौशल की प्राप्ति विषय हो।
शकुन फल:
यह प्रश्न-फल उत्तम है। निम्नलिखित प्रश्नों में परिणाम अनुकूल रहेगा:
- कोई विशेष विद्या, कौशल या प्रशिक्षण सीखना
- सेवा या कार्य के बदले मिलने वाला ज्ञान
- किसी बाधा या विरोधी का निवारण
- गुरु से दीक्षा या विशेष शिक्षा
- किसी की रक्षा या सहायता करने का अवसर
इस दोहे के आने पर प्रश्न-फल उत्तम है। जो सेवा या कार्य कर रहे हैं, उसके बदले मूल्यवान ज्ञान और आशीर्वाद मिलेगा।
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