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रामाज्ञा प्रश्न / चतुर्थ सर्ग / सप्तक 6 / श्लोक 4

रामाज्ञा प्रश्न चतुर्थ सर्ग सप्तक 6 श्लोक 4 — मुनियों को निर्भय कर धनुष-यज्ञ हेतु जनकपुर प्रस्थान; श्रेष्ठ प्रश्न-फल।

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सात सर्ग, प्रत्येक सर्ग में सात सप्तक और प्रत्येक सप्तक में सात दोहे — यही ॥रामाज्ञा प्रश्न॥ की सरल किंतु सुगठित संरचना है। इस छठे सप्तक के चौथा दोहे में चतुर्थ सर्ग की वही शुभ धारा है जो हर मनोरथ की पूर्ति का भरोसा देती है।

मुनियों को निर्भय कर धनुष-यज्ञ की ओर प्रस्थान — प्रश्न-फल श्रेष्ठ है।

मूल दोहा: अभय किए मुनि राखि मख, धरें बान धनु हाथ। धनु मख कौतुक जनकपुर चले गाधिसुत साथ॥४॥

शब्दार्थ:

  • अभय किए = निर्भय कर दिया
  • राखि मख = यज्ञ की रक्षा करके
  • धरें = धारण किए
  • बान धनु = धनुष-बाण
  • धनु मख = धनुष-यज्ञ
  • कौतुक = क्रीड़ा, आयोजन
  • जनकपुर = जनकपुर
  • गाधिसुत = विश्वामित्रजी

अभय किए मुनि राखि मख = यज्ञ की रक्षा कर मुनियों को निर्भय किया। धनु मख कौतुक जनकपुर चले = धनुष-यज्ञ का आयोजन देखने जनकपुर चले।

भावार्थ / व्याख्या:

हाथ में धनुष-बाण लेकर प्रभु ने यज्ञ की रक्षा की और मुनियों को निर्भय कर दिया। फिर वे विश्वामित्रजी के साथ धनुष-यज्ञ का आयोजन देखने जनकपुर चले।

इस दोहे में एक चरण पूरा होकर दूसरा आरंभ हो रहा है। एक कार्य सफलतापूर्वक पूरा हुआ और उसी सफलता के बल पर अगला अवसर सामने आ गया।

तुलसीदास जी इस प्रश्न-फल को ‘श्रेष्ठ’ कहते हैं। शकुन की दृष्टि से यह दोहा उन प्रश्नों में विशेष अनुकूल है जहाँ एक कार्य पूरा करके दूसरे की ओर बढ़ना विषय हो। यह बताता है कि पहली सफलता ही अगले बड़े अवसर का द्वार खोलेगी।

शकुन फल:

यह प्रश्न-फल श्रेष्ठ है। निम्नलिखित प्रश्नों में परिणाम अत्यंत अनुकूल:

  • एक कार्य पूरा करके दूसरे की ओर बढ़ना
  • पहली सफलता से खुलने वाला नया अवसर
  • किसी को भय या संकट से मुक्त करना
  • किसी आयोजन या समारोह में सम्मिलित होना
  • सुरक्षा और तैयारी के साथ अगला कदम

इस दोहे के आने पर प्रश्न-फल श्रेष्ठ है। जो कार्य पूरा किया है, वही अगले बड़े अवसर का द्वार खोलेगा। रुकें नहीं, आगे बढ़ें।

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