रामाज्ञा प्रश्न / चतुर्थ सर्ग / सप्तक 5 / श्लोक 7
रामाज्ञा प्रश्न चतुर्थ सर्ग सप्तक 5 श्लोक 7 — पर्वत, नदी, वन और पशु-पक्षियों की शोभा देखते हुए प्रभु की यात्रा; यात्रा सुखद होने का शकुन।
प्रश्न पूछने की परंपरा में मन को एकाग्र कर, श्रीराम का स्मरण करते हुए सर्ग, सप्तक और दोहा — तीनों संख्याएँ चुनी जाती हैं। चतुर्थ सर्ग के पाँचवें सप्तक का सातवाँ दोहा प्रस्तुत है, जिसमें उत्सव, विवाह और मंगल-कार्य के शकुन देखे जाते हैं।
मार्ग की प्राकृतिक शोभा — यात्रा सुखद होगी।
मूल दोहा: सैल सरित सर बाग बन, मृग बिहंग बहुरंग। तुलसी देखत जात प्रभु मुदित गाधिसुत संग॥७॥
शब्दार्थ:
- सैल = पर्वत
- सरित = नदी
- सर = सरोवर
- बाग बन = उपवन और वन
- मृग = पशु
- बिहंग = पक्षी
- बहुरंग = अनेक रंगों के
- देखत जात = देखते हुए जा रहे हैं
- गाधिसुत = गाधि-पुत्र (विश्वामित्रजी)
सैल सरित सर बाग बन, मृग बिहंग बहुरंग = पर्वत, नदी, सरोवर, उपवन, वन और अनेक रंगों के पशु-पक्षी। तुलसी देखत जात प्रभु मुदित = प्रभु आनंदित होकर देखते हुए जा रहे हैं।
भावार्थ / व्याख्या:
तुलसीदास जी कहते हैं कि प्रभु पर्वत, नदी, सरोवर, वन, उपवन तथा अनेक रंगों के पशु-पक्षी देखते हुए आनंदित होकर विश्वामित्रजी के साथ जा रहे हैं।
इस दोहे में यात्रा का आनंद है। वे युद्ध के लिए जा रहे थे, फिर भी मार्ग की सुंदरता का आनंद ले रहे थे — यह जीवन के प्रति एक स्वस्थ दृष्टिकोण है।
तुलसीदास जी इसका शकुन-फल स्पष्ट बताते हैं — यात्रा सुखद होगी। शकुन की दृष्टि से यह दोहा यात्रा संबंधी प्रश्नों में सीधा और अनुकूल उत्तर देता है, विशेषकर उन यात्राओं के लिए जो प्राकृतिक स्थलों या तीर्थों की ओर हों।
शकुन फल:
यह शकुन बताता है कि यात्रा सुखद होगी। निम्नलिखित प्रश्नों में:
- कोई भी यात्रा या प्रस्थान
- तीर्थयात्रा या प्राकृतिक स्थलों का भ्रमण
- किसी अनुभवी व्यक्ति के साथ यात्रा
- लंबे मार्ग की यात्रा और उसका अनुभव
- कार्य के साथ-साथ आनंद का अवसर
इस दोहे के आने पर यात्रा सुखद होगी। मार्ग की कठिनाई की चिंता न करें — रास्ता स्वयं आनंददायी रहेगा।
आस्था और भक्ति के हमारे मिशन का समर्थन करेंहर सहयोग, चाहे बड़ा हो या छोटा, फर्क डालता है! आपका सहयोग हमें इस मंच को बनाए रखने और पौराणिक कहानियों को अधिक लोगो तक फैलाने में मदद करता है। सहयोग करें |
टिप्पणियाँ बंद हैं।