रामाज्ञा प्रश्न / चतुर्थ सर्ग / सप्तक 1 / श्लोक 7
रामाज्ञा प्रश्न चतुर्थ सर्ग सप्तक 1 श्लोक 7 — भरत, लक्ष्मण, शत्रुघ्न का प्रकट होना; विधाता अर्थात् भाग्य के अनुकूल होने का शुभ शकुन।
प्रश्न पूछने की परंपरा में मन को एकाग्र कर, श्रीराम का स्मरण करते हुए सर्ग, सप्तक और दोहा — तीनों संख्याएँ चुनी जाती हैं। यह पहले सप्तक का सातवाँ दोहा है। चतुर्थ सर्ग श्रीराम-जन्म से लेकर चारों भाइयों के विवाह तक के मंगलमय प्रसंगों का सर्ग है।
चारों भाइयों का प्रकट होना — विधाता अनुकूल है।
मूल दोहा: भरत लखन रिपुदवन सब सुवन सुमंगल मुल। प्रगट भए नृप सुकृत फल तुलसी बिधि अनुकुल॥७॥
शब्दार्थ:
- रिपुदवन = शत्रुओं का दमन करने वाले (शत्रुघ्न)
- सुवन = पुत्र
- सुमंगल मुल = श्रेष्ठ मंगलों के मूल
- प्रगट भए = प्रकट हुए
- नृप सुकृत फल = राजा के पुण्यों के फलस्वरूप
- बिधि अनुकुल = विधाता, भाग्य अनुकूल
सुवन सुमंगल मुल = ये पुत्र श्रेष्ठ मंगलों के मूल हैं। तुलसी बिधि अनुकुल = विधाता अर्थात् भाग्य अनुकूल है।
भावार्थ / व्याख्या:
भरत, लक्ष्मण और शत्रुघ्न — ये सब श्रेष्ठ मंगलों के मूलस्वरूप पुत्र महाराज दशरथ के पुण्यों के फलस्वरूप प्रकट हुए।
तुलसीदास जी इस शकुन का सार एक वाक्य में देते हैं — विधाता अर्थात् भाग्य अनुकूल है।
यह अत्यंत महत्वपूर्ण संकेत है। रामाज्ञा प्रश्न में कई दोहे ‘बाम बिधाता’ अर्थात् प्रतिकूल भाग्य की बात करते हैं। यह दोहा उसका ठीक उल्टा है। शकुन की दृष्टि से इसका अर्थ है कि इस समय परिस्थितियाँ आपके पक्ष में हैं — जो भी प्रयत्न करेंगे, भाग्य साथ देगा।
शकुन फल:
यह शकुन बताता है कि विधाता अर्थात् भाग्य अनुकूल है। निम्नलिखित प्रश्नों में:
- भाग्य और समय की अनुकूलता का प्रश्न
- संतान और परिवार की वृद्धि
- पुण्य कर्मों का प्रत्यक्ष फल
- कोई भी कार्य जिसमें भाग्य का साथ चाहिए
- लंबे समय के प्रयत्न का परिणाम
इस दोहे के आने पर भाग्य पूरी तरह अनुकूल है। जो भी प्रयत्न करेंगे, परिस्थितियाँ साथ देंगी। यह अवसर व्यर्थ न जाने दें।
आस्था और भक्ति के हमारे मिशन का समर्थन करेंहर सहयोग, चाहे बड़ा हो या छोटा, फर्क डालता है! आपका सहयोग हमें इस मंच को बनाए रखने और पौराणिक कहानियों को अधिक लोगो तक फैलाने में मदद करता है। सहयोग करें |
टिप्पणियाँ बंद हैं।