रामाज्ञा प्रश्न / चतुर्थ सर्ग / सप्तक 2 / श्लोक 1
रामाज्ञा प्रश्न चतुर्थ सर्ग सप्तक 2 श्लोक 1 — अयोध्या के घर-घर बधाई और त्रिदेवों की प्रसन्नता; यह प्रश्न-फल श्रेष्ठ है।
इस ग्रंथ में उत्तर सीधा नहीं, प्रसंग के माध्यम से मिलता है — जो प्रसंग सामने आए, उसी का भाव प्रश्न का फल बन जाता है। प्रस्तुत दोहा चतुर्थ सर्ग के दूसरे सप्तक में पहला स्थान पर है, जहाँ संतान, यज्ञ और शुभ मुहूर्त के संकेत मिलते हैं।
अयोध्या में घर-घर बधाई — यह प्रश्न-फल श्रेष्ठ है।
मूल दोहा: घर घर अवध बधावने, मुदित नगर नर नारि। बरषि सुमन हरषहिं बिबुध, बिधि त्रिपुरारि मुरारि॥१॥
शब्दार्थ:
- बधावने = बधाई के बाजे
- मुदित = आनंदित
- बरषि सुमन = पुष्प-वर्षा करके
- हरषहिं = प्रसन्न होते हैं
- बिबुध = देवता
- बिधि = ब्रह्माजी
- त्रिपुरारि = शंकरजी
- मुरारि = विष्णु भगवान
घर घर अवध बधावने = अयोध्या के हर घर में बधाई बज रही है। बिधि त्रिपुरारि मुरारि = ब्रह्मा, शंकर और विष्णु प्रसन्न हो रहे हैं।
भावार्थ / व्याख्या:
अयोध्या के प्रत्येक घर में बधाई बज रही है और नगर के नर-नारी सब आनंदित हैं। पुष्प-वर्षा करके देवता, ब्रह्माजी, शंकरजी और विष्णु भगवान प्रसन्न हो रहे हैं।
इस दोहे में तीनों लोकों का आनंद एक साथ है — पृथ्वी पर नगरवासी, आकाश में देवता, और स्वयं त्रिदेव।
तुलसीदास जी इस प्रश्न-फल को ‘श्रेष्ठ’ कहते हैं। शकुन की दृष्टि से यह उन प्रश्नों में विशेष अनुकूल है जहाँ किसी शुभ समाचार, उत्सव या सामूहिक प्रसन्नता का अवसर विषय हो। यह बताता है कि आपकी खुशी अकेली नहीं रहेगी — पूरा परिवार और समाज उसमें सम्मिलित होगा।
शकुन फल:
यह प्रश्न-फल श्रेष्ठ है। निम्नलिखित प्रश्नों में परिणाम अत्यंत अनुकूल:
- कोई शुभ समाचार या उत्सव का अवसर
- संतान-जन्म या परिवार में वृद्धि
- सामूहिक प्रसन्नता और सामाजिक स्वीकृति
- बड़ी सफलता जिसका सब उत्सव मनाएँ
- देवी-देवताओं की कृपा से जुड़ा प्रश्न
इस दोहे के आने पर प्रश्न-फल श्रेष्ठ है। घर-घर उत्सव जैसा वातावरण बनेगा। आपकी खुशी में पूरा परिवार और समाज सम्मिलित होगा।
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