रामाज्ञा प्रश्न / चतुर्थ सर्ग / सप्तक 2 / श्लोक 2
रामाज्ञा प्रश्न चतुर्थ सर्ग सप्तक 2 श्लोक 2 — दशरथजी के पुण्य रूपी कल्पवृक्ष में चार सुंदर पुत्र-फल; शुभ प्रश्न-फल।
॥रामाज्ञा प्रश्न॥ तुलसीदास जी की उन रचनाओं में गिना जाता है जो भक्ति के साथ-साथ व्यावहारिक मार्गदर्शन भी देती हैं। प्रस्तुत दोहा चतुर्थ सर्ग के दूसरे सप्तक में दूसरा स्थान पर है, जहाँ संतान, यज्ञ और शुभ मुहूर्त के संकेत मिलते हैं।
पुण्य रूपी कल्पवृक्ष में चार सुंदर फल — प्रश्न-फल शुभ है।
मूल दोहा: मंगल गान निसान नभ, नगर मुदित नर नारि। भूप सुकृत सुरतरु निरखि फरे चारु फल चारि॥२॥
शब्दार्थ:
- मंगल गान = मंगलगीत
- निसान = नगाड़े
- नभ = आकाश
- भूप सुकृत = राजा के पुण्य
- सुरतरु = कल्पवृक्ष
- निरखि = देखकर
- फरे = फले
- चारु फल चारि = चार सुंदर फल
मंगल गान निसान नभ = आकाश में मंगलगान और नगाड़े हो रहे हैं। भूप सुकृत सुरतरु फरे चारु फल चारि = राजा के पुण्य रूपी कल्पवृक्ष में चार सुंदर फल लगे।
भावार्थ / व्याख्या:
आकाश में देवताओं द्वारा मंगल-गान हो रहा है तथा नगाड़े बज रहे हैं। नगर के स्त्री-पुरुष महाराज दशरथ के पुण्य रूपी कल्पवृक्ष में चार सुंदर पुत्र रूपी फल लगे देखकर आनंदमग्न हैं।
यह रूपक अत्यंत सुंदर है। पुण्य को कल्पवृक्ष और संतान को उसका फल बताया गया है। कल्पवृक्ष वर्षों की साधना से फलता है — इसी प्रकार पुण्य कर्मों का फल भी समय लेकर आता है, पर आता अवश्य है।
शकुन की दृष्टि से यह दोहा शुभ है और विशेषकर उन प्रश्नों में अनुकूल है जहाँ लंबे समय से किए जा रहे सत्कर्मों या प्रयत्नों का फल विषय हो।
शकुन फल:
यह प्रश्न-फल शुभ है। निम्नलिखित प्रश्नों में परिणाम अनुकूल रहेगा:
- लंबे समय के पुण्य कर्मों या प्रयत्नों का फल
- संतान और उसकी उपलब्धियाँ
- एक साथ कई लाभ या सफलताएँ
- समाज में प्रतिष्ठा और प्रशंसा
- धैर्यपूर्वक की गई साधना का परिणाम
इस दोहे के आने पर प्रश्न-फल शुभ है। आपके पुण्य रूपी वृक्ष में फल लग चुके हैं — जो प्रयत्न किया है, उसका परिणाम अब दिखेगा।
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