रामाज्ञा प्रश्न / तृतीय सर्ग / सप्तक 4 / श्लोक 2
रामाज्ञा प्रश्न तृतीय सर्ग सप्तक 4 श्लोक 2 — शत्रुघ्नजी के चरण-स्मरण से शत्रु की पराजय और अपनी विजय का शुभ शकुन।
॥रामाज्ञा प्रश्न॥ तुलसीदास जी की उन रचनाओं में गिना जाता है जो भक्ति के साथ-साथ व्यावहारिक मार्गदर्शन भी देती हैं। यह दोहा तृतीय सर्ग के चौथे सप्तक में क्रम से दूसरा है — यहाँ विरह, खोज और कठिनाई से पार पाने के संकेत मिलते हैं।
शत्रुघ्नजी का स्मरण — शत्रु की पराजय और अपनी विजय।
मूल दोहा: सुमिरि सत्रुसूदन चरन चलहु करहु सब काज। सत्रु पराजय निज बिजय, सगुन सुमंगल साज॥२॥
शब्दार्थ:
- सुमिरि = स्मरण करके
- सत्रुसूदन = शत्रुओं का नाश करने वाले (शत्रुघ्नजी)
- चरन = चरण
- चलहु = चलो
- सत्रु पराजय = शत्रु की हार
- निज बिजय = अपनी विजय
- सुमंगल साज = कल्याण की सामग्री
सुमिरि सत्रुसूदन चरन चलहु करहु सब काज = शत्रुघ्नजी के चरणों का स्मरण करके चलो और सब काम करो। सत्रु पराजय निज बिजय = शत्रु की पराजय और अपनी विजय।
भावार्थ / व्याख्या:
श्रीशत्रुघ्नजी के चरणों का स्मरण करके चलो और सब काम करो। तुलसीदास जी कहते हैं कि यह शकुन शत्रु की पराजय, अपनी विजय तथा कल्याण की सामग्री जुटाने वाला है।
इस दोहे में ‘चलहु’ और ‘करहु’ दोनों क्रियाएँ हैं — अर्थात् यह शकुन यात्रा और कार्य दोनों के लिए अनुकूल है।
शत्रुघ्नजी रामायण के सबसे मौन पात्र हैं। वे बोलते कम हैं, करते अधिक हैं। इसीलिए यह दोहा उन प्रश्नों में विशेष शुभ है जहाँ शोर मचाए बिना, चुपचाप काम करके परिणाम लाना हो। शत्रु को पराजित करने का सबसे प्रभावी तरीका यही है।
शकुन फल:
यह शकुन शत्रु-पराजय और अपनी विजय का सूचक है। निम्नलिखित प्रश्नों में:
- किसी शत्रु, विरोधी या प्रतिद्वंद्वी से मुकाबला
- मुकदमा, विवाद या कानूनी लड़ाई
- व्यापारिक प्रतिस्पर्धा या बाज़ार में टक्कर
- यात्रा और कार्य दोनों एक साथ
- बिना शोर के चुपचाप किया जाने वाला कार्य
इस दोहे के आने पर शत्रु की पराजय और आपकी विजय का संकेत है। शोर मचाए बिना, शांति से अपना काम करते रहें — परिणाम आपके पक्ष में होगा।
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