रामाज्ञा प्रश्न / तृतीय सर्ग / सप्तक 4 / श्लोक 3
रामाज्ञा प्रश्न तृतीय सर्ग सप्तक 4 श्लोक 3 — भरतजी के नाम-स्मरण से कपट, क्लेश और कुचाल का मिटना; नीति, प्रेम और विश्वास का मंगलदायक शकुन।
शकुन शुभ है या अशुभ — यह निर्णय ॥रामाज्ञा प्रश्न॥ में उसी प्रसंग से होता है जो चुने हुए दोहे में वर्णित है। यह दोहा तृतीय सर्ग के चौथे सप्तक में क्रम से तीसरा है — यहाँ विरह, खोज और कठिनाई से पार पाने के संकेत मिलते हैं।
भरतजी का नाम — कपट, क्लेश और कुचाल मिटाने वाला।
मूल दोहा: भरत नाम सुमिरत मिटहिं कपट कलेस कुचालि। नीति प्रीति परतीति हित, सगुन सुमंगल सालि॥३॥
शब्दार्थ:
- सुमिरत = स्मरण करते ही
- मिटहिं = मिट जाते हैं
- कपट = छल
- कलेस = क्लेश, कष्ट
- कुचालि = दुष्टों की कुचाल
- नीति = नीति-व्यवहार
- प्रीति = प्रेम
- परतीति = विश्वास
- सालि = अच्छी फसल, समृद्धि
भरत नाम सुमिरत मिटहिं कपट कलेस कुचालि = भरतजी का नाम स्मरण करते ही कपट, क्लेश और कुचाल मिट जाते हैं। नीति प्रीति परतीति हित = नीति, प्रेम और विश्वास के लिए मंगलदायक।
भावार्थ / व्याख्या:
श्रीभरतजी के नाम का स्मरण करते ही कपट, क्लेश और दुष्टों की कुचाल मिट जाती है। नीति-व्यवहार, प्रेम तथा विश्वास के लिए यह शकुन मंगलदायक है।
भरतजी का जीवन ही निष्कपटता का प्रमाण है। उन्हें राज्य मिला था और वे चाहते तो रख सकते थे — कोई उन्हें रोकने वाला नहीं था। परंतु उन्होंने वह नहीं लिया जो धर्मतः उनका नहीं था।
शकुन की दृष्टि से यह दोहा उन प्रश्नों में विशेष शुभ है जहाँ किसी षड्यंत्र, गलतफहमी या टूटे विश्वास की समस्या हो। यह आश्वासन देता है कि छल उजागर होगा, गलतफहमी दूर होगी और संबंधों में विश्वास लौटेगा।
शकुन फल:
यह शकुन कपट-निवारण और विश्वास की वापसी का सूचक है। निम्नलिखित प्रश्नों में:
- किसी षड्यंत्र, छल या धोखे से मुक्ति
- टूटे हुए विश्वास का पुनः जुड़ना
- गलतफहमी या ग़लत आरोप का दूर होना
- पारिवारिक या व्यावसायिक संबंधों में सुधार
- नीति और ईमानदारी से किया जाने वाला व्यवहार
इस दोहे के आने पर कपट और कुचाल मिटने का संकेत है। जो षड्यंत्र या गलतफहमी है वह दूर होगी और संबंधों में विश्वास लौटेगा। सच्चाई और नीति पर बने रहें।
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