रामाज्ञा प्रश्न / तृतीय सर्ग / सप्तक 2 / श्लोक 2
रामाज्ञा प्रश्न तृतीय सर्ग सप्तक 2 श्लोक 2 — रावण की सभा में रक्त से लथपथ शूर्पणखा का विलाप; यह प्रश्न-फल अशुभ है।
॥रामाज्ञा प्रश्न॥ तुलसीदास जी की उन रचनाओं में गिना जाता है जो भक्ति के साथ-साथ व्यावहारिक मार्गदर्शन भी देती हैं। प्रस्तुत दोहा तृतीय सर्ग के दूसरे सप्तक में दूसरा स्थान पर है, जहाँ छल, कलह और आकस्मिक भय की चेतावनियाँ बार-बार मिलती हैं।
रावण की सभा में शूर्पणखा का विलाप — प्रश्न-फल अशुभ।
मूल दोहा: बसन सकल सोनित समल, बिकट बदन गत गात। रोवति रावन की सभाँ, तात मात हा भ्रात॥२॥
शब्दार्थ:
- बसन = वस्त्र
- सोनित = रक्त
- समल = सना हुआ, मैला
- बिकट बदन = भयंकर मुख
- गत गात = कटे हुए अंग
- रोवति = रोती है
- सभाँ = सभा में
- तात मात = हाय पिता, हाय माता
- भ्रात = भाई
बसन सकल सोनित समल = सब वस्त्र रक्त से लथपथ हैं। तात मात हा भ्रात = हाय बाप, हाय मैया, हाय भैया कहकर रोती है।
भावार्थ / व्याख्या:
शूर्पणखा के सब वस्त्र रक्त से लथपथ हैं, मुख भयंकर है और नाक-कान कटे हुए हैं। रावण की सभा में वह ‘हाय बाप! हाय मैया! हाय भैया!’ कहकर विलाप कर रही है।
यह दृश्य अत्यंत करुण है, परंतु इसके पीछे उकसावे की मंशा भी है। शूर्पणखा केवल रो नहीं रही, वह रावण को भड़का भी रही है।
शकुन की दृष्टि से यह दोहा अशुभ है। यह उस स्थिति की चेतावनी देता है जहाँ किसी की करुण कहानी या भावनात्मक अपील के पीछे कोई और उद्देश्य छिपा हो। इस समय भावनाओं में बहकर लिया गया कोई भी निर्णय हानिकारक सिद्ध होगा।
शकुन फल:
यह प्रश्न-फल अशुभ है। निम्नलिखित प्रश्नों में सतर्क रहें:
- किसी की भावनात्मक अपील पर लिया जा रहा निर्णय
- किसी के पक्ष में हस्तक्षेप करने का दबाव
- परिवार या रिश्तेदार की शिकायत पर प्रतिक्रिया
- अपमान या मान-हानि की स्थिति
- बदला लेने की भावना से उठाया जा रहा कदम
इस दोहे के आने पर प्रश्न-फल अशुभ है। भावनाओं में बहकर कोई निर्णय न लें। दोनों पक्षों की बात सुनने से पहले कोई कदम न उठाएँ।
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