रामाज्ञा प्रश्न / तृतीय सर्ग / सप्तक 2 / श्लोक 1
रामाज्ञा प्रश्न तृतीय सर्ग सप्तक 2 श्लोक 1 — खर-दूषण के वध के बाद शूर्पणखा का लंका प्रस्थान; अशुभ और अमंगलों की खान वाला शकुन।
इस ग्रंथ में उत्तर सीधा नहीं, प्रसंग के माध्यम से मिलता है — जो प्रसंग सामने आए, उसी का भाव प्रश्न का फल बन जाता है। प्रस्तुत दोहा तृतीय सर्ग के दूसरे सप्तक में पहला स्थान पर है, जहाँ छल, कलह और आकस्मिक भय की चेतावनियाँ बार-बार मिलती हैं।
शूर्पणखा का लंका प्रस्थान — अशुभ और अमंगलों की खान।
मूल दोहा: सुभट सहस चौदह सहित भाइ काल बस जानि। सूपनखा लंकहि चली असुभ अमंगल खानि॥१॥
शब्दार्थ:
- सुभट = उच्च कोटि के योद्धा
- सहस चौदह = चौदह हजार
- सहित = सहित
- काल बस = काल के वश, मृत
- जानि = जानकर
- लंकहि चली = लंका की ओर चली
- असुभ अमंगल खानि = अशुभ और अमंगलों की खान
भाइ काल बस जानि = भाइयों को मरा जानकर। असुभ अमंगल खानि = अशुभ और अमंगलों की खान।
भावार्थ / व्याख्या:
चौदह हजार उच्च कोटि के योद्धा राक्षसों सहित अपने भाइयों खर-दूषण को मारा गया जानकर, अशुभ और अमंगलों की खान शूर्पणखा लंका के लिए प्रस्थान कर गई।
यह क्षण रामायण का एक बड़ा मोड़ है। शूर्पणखा का लंका जाना ही आगे चलकर सीता-हरण और महायुद्ध का कारण बना। एक व्यक्ति की शिकायत ने पूरे वंश को नष्ट कर दिया।
तुलसीदास जी उसे ‘अमंगलों की खान’ कहते हैं — अर्थात् जहाँ से लगातार अमंगल निकलते रहें। शकुन की दृष्टि से यह दोहा अशुभ है। यह उस स्थिति का संकेत देता है जहाँ कोई व्यक्ति आपकी शिकायत लेकर किसी बड़े के पास जा रहा हो, या कोई पुराना विवाद फिर से भड़कने वाला हो।
शकुन फल:
यह प्रश्न-फल अशुभ है। निम्नलिखित प्रश्नों में विशेष सावधानी:
- किसी की शिकायत या रिपोर्ट का बड़े तक पहुँचना
- सुलझा हुआ विवाद फिर से भड़कना
- किसी पराजित विरोधी का बदला लेने का प्रयास
- बड़ी हानि के बाद उत्पन्न नई समस्या
- ऐसा व्यक्ति जो लगातार समस्या खड़ी करता हो
इस दोहे के आने पर प्रश्न-फल अशुभ है। जो विवाद समाप्त लग रहा था, वह फिर उठ सकता है। सतर्क रहें और अपना पक्ष लिखित रूप में सुरक्षित रखें।
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