रामाज्ञा प्रश्न / तृतीय सर्ग / सप्तक 2 / श्लोक 3
रामाज्ञा प्रश्न तृतीय सर्ग सप्तक 2 श्लोक 3 — कालरात्रि समान विकराल शूर्पणखा को देख रावण की सभा का भयभीत होना; अनिष्ट सूचक शकुन।
शकुन शुभ है या अशुभ — यह निर्णय ॥रामाज्ञा प्रश्न॥ में उसी प्रसंग से होता है जो चुने हुए दोहे में वर्णित है। प्रस्तुत दोहा तृतीय सर्ग के दूसरे सप्तक में तीसरा स्थान पर है, जहाँ छल, कलह और आकस्मिक भय की चेतावनियाँ बार-बार मिलती हैं।
सभा का भयभीत होना — यह प्रश्न-फल अनिष्ट है।
मूल दोहा: काल कि मुरति कालिका कालराति बिकराल। बिनु पहिचाने लंकपति सभा सभय तेहि काल॥३॥
शब्दार्थ:
- काल कि मुरति = काल की मूर्ति
- कालिका = कालिका देवी
- कालराति = कालरात्रि
- बिकराल = भयंकर
- बिनु पहिचाने = पहचान न सकने के कारण
- लंकपति = लंकापति रावण
- सभा सभय = सभा भयभीत
- तेहि काल = उस समय
काल कि मुरति कालिका कालराति बिकराल = काल की मूर्ति, कालिका अथवा कालरात्रि के समान भयंकर। सभा सभय तेहि काल = उस समय सभा भयभीत हो गई।
भावार्थ / व्याख्या:
काल की मूर्ति, कालिका अथवा कालरात्रि के समान भयंकर दिखने वाली शूर्पणखा को पहचान न सकने के कारण उस समय रावण की सभा के लोग भयभीत हो गए।
यह दृश्य अशुभ का शिखर है। सभा में बैठे लोग अपनी ही राजकुमारी को पहचान नहीं पाए और भयभीत हो गए। यह उस विनाश का पूर्वसंकेत था जो आगे लंका पर आने वाला था।
शकुन की दृष्टि से यह दोहा अनिष्ट सूचक है। यह उस स्थिति का संकेत देता है जहाँ कोई परिचित व्यक्ति या परिचित परिस्थिति अचानक अपरिचित और भयावह रूप ले ले। इस समय भय, अनिश्चितता और अस्थिरता का वातावरण रहेगा।
शकुन फल:
यह प्रश्न-फल अनिष्ट है। निम्नलिखित प्रश्नों में विशेष सावधानी:
- परिचित व्यक्ति या स्थिति का अचानक बदल जाना
- भय, आतंक या अनिश्चितता की स्थिति
- किसी सभा, बैठक या सामूहिक निर्णय का माहौल
- अप्रत्याशित और चौंकाने वाली घटना
- संस्था या परिवार में उत्पन्न अस्थिरता
इस दोहे के आने पर प्रश्न-फल अनिष्ट है। स्थिति अप्रत्याशित रूप से बदल सकती है। इस समय कोई प्रतिबद्धता न करें और स्थिति स्पष्ट होने की प्रतीक्षा करें।
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