रामाज्ञा प्रश्न / द्वितीय सर्ग / सप्तक 6 / श्लोक 5
रामाज्ञा प्रश्न द्वितीय सर्ग सप्तक 6 श्लोक 5 — जयंत की कुचाल, विराध-वध और शरभंग का देह-त्याग; हानि, मृत्यु और अनर्थ का सूचक अशुभ शकुन।
जब मन किसी दुविधा में हो, तब ॥रामाज्ञा प्रश्न॥ का एक दोहा भी दिशा दिखाने के लिए पर्याप्त माना गया है। इस छठे सप्तक के पाँचवाँ दोहे में द्वितीय सर्ग का वही भाव है जहाँ परिस्थिति बदलती है और शकुन भी उसी के अनुसार फल देता है।
जयंत, विराध और शरभंग प्रसंग — हानि और मृत्यु का सूचक अशुभ शकुन।
मूल दोहा: काक कुचालि बिराध बध देह तजी सरभंग। हानि मरन सूचक सगुन अनरथ असुभ प्रसंग॥५॥
शब्दार्थ:
- काक = कौआ (जयंत)
- कुचालि = कुचाल, दुष्टता
- बिराध बध = विराध राक्षस का वध
- देह तजी = शरीर त्यागा
- सरभंग = शरभंग ऋषि
- हानि = नुकसान
- मरन = मृत्यु
- अनरथ = अनर्थ
- प्रसंग = अवसर, घटना
काक कुचालि बिराध बध = कौए की कुचाल और विराध का वध। हानि मरन सूचक सगुन = यह शकुन हानि और मृत्यु का सूचक है।
भावार्थ / व्याख्या:
इंद्रपुत्र जयंत ने कौए का रूप धरकर कुचाल चली और श्रीजानकीजी के चरणों में चोंच मारी। विराध राक्षस को प्रभु ने मारा। शरभंग ऋषि ने प्रभु के सम्मुख शरीर त्याग दिया।
तुलसीदास जी स्पष्ट कहते हैं — यह शकुन हानि, मृत्यु, अनर्थ और अशुभ अवसरों के आने का सूचक है।
इन तीनों प्रसंगों में एक समानता है — सबमें कोई न कोई अंत या विनाश है। शकुन की दृष्टि से यह दोहा अशुभ है और स्पष्ट चेतावनी देता है। इस समय जोखिम लेना, किसी से उलझना या बड़ा निर्णय लेना हानिकारक हो सकता है।
शकुन फल:
यह शकुन हानि, मृत्यु और अनर्थ का सूचक है। निम्नलिखित प्रश्नों में विशेष सतर्कता:
- स्वास्थ्य, दुर्घटना या जीवन-सुरक्षा से जुड़ा प्रश्न
- बड़ा आर्थिक निवेश या जोखिम भरा सौदा
- किसी शत्रु, दुष्ट या षड्यंत्रकारी से सामना
- यात्रा, विशेषकर जोखिम भरे मार्ग की
- कोई भी नया आरंभ या बड़ा परिवर्तन
इस दोहे के आने पर हानि और अनर्थ की चेतावनी है। इस समय हर प्रकार का जोखिम टालें, सतर्क रहें और कोई बड़ा निर्णय न लें। श्रीराम का स्मरण और सत्कर्म ही रक्षा है।
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