रामाज्ञा प्रश्न / द्वितीय सर्ग / सप्तक 6 / श्लोक 4
रामाज्ञा प्रश्न द्वितीय सर्ग सप्तक 6 श्लोक 4 — अनसूयाजी द्वारा जानकीजी को वस्त्र-आभूषण; संतोष, सुख और सब दुःख दूर होने का शुभ शकुन।
सात सर्ग, प्रत्येक सर्ग में सात सप्तक और प्रत्येक सप्तक में सात दोहे — यही ॥रामाज्ञा प्रश्न॥ की सरल किंतु सुगठित संरचना है। इस छठे सप्तक के चौथा दोहे में द्वितीय सर्ग का वही भाव है जहाँ परिस्थिति बदलती है और शकुन भी उसी के अनुसार फल देता है।
अनसूयाजी का जानकीजी को वस्त्र-आभूषण देना — संतोष, सुख और दुःख-निवृत्ति।
मूल दोहा: दिए अत्रि तिय जानकिहि बसन बिभुषन भूरि। राम कृपा संतोष सुख होहिं सकल दुख दुरि॥४॥
शब्दार्थ:
- अत्रि तिय = अत्रि मुनि की पत्नी (अनसूयाजी)
- जानकिहि = श्रीजानकीजी को
- बसन = वस्त्र
- बिभुषन = आभूषण
- भूरि = बहुत सारे
- संतोष = संतोष
- सकल दुख दुरि = सब दुःख दूर
दिए अत्रि तिय जानकिहि = अनसूयाजी ने जानकीजी को दिए। होहिं सकल दुख दुरि = सब दुःख दूर हो जाएँगे।
भावार्थ / व्याख्या:
महर्षि अत्रि की पत्नी अनसूयाजी ने श्रीजानकीजी को बहुत से वस्त्र और आभूषण दिए। ये कोई साधारण वस्त्र नहीं थे — पुराणों के अनुसार वे कभी मैले नहीं होते थे और उनकी चमक कम नहीं होती थी।
तुलसीदास जी इसका शकुन-फल बताते हैं — श्रीराम की कृपा से संतोष तथा सुख प्राप्त होंगे और सब दुःख दूर हो जाएँगे।
इस दोहे में ‘संतोष’ शब्द विशेष है। सुख और संतोष अलग-अलग हैं — सुख बाहर से आता है, संतोष भीतर से। यह दोहा दोनों का वचन देता है, जो दुर्लभ संयोग है। यह वनवास के बीच मिला अप्रत्याशित उपहार था — इसीलिए यह अनपेक्षित सहायता का भी सूचक है।
शकुन फल:
यह शकुन संतोष, सुख और दुःख-निवृत्ति का सूचक है। निम्नलिखित प्रश्नों में:
- किसी बड़े या वरिष्ठ व्यक्ति से सहायता या उपहार
- कठिन समय में अप्रत्याशित सहयोग
- वस्त्र, आभूषण या भेंट से जुड़ा प्रश्न
- लंबे समय से चले आ रहे दुःख की समाप्ति
- स्त्रियों से मिलने वाली सहायता या आशीर्वाद
इस दोहे के आने पर संतोष और सुख की प्राप्ति तथा सब दुःखों के दूर होने का संकेत मिलता है। किसी वरिष्ठ से अप्रत्याशित सहायता मिल सकती है।
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