रामाज्ञा प्रश्न / द्वितीय सर्ग / सप्तक 6 / श्लोक 6
रामाज्ञा प्रश्न द्वितीय सर्ग सप्तक 6 श्लोक 6 — राम-लक्ष्मण से मुनियों का मिलन; सत्संग तभी मिलता है जब सीताराम अनुकूल हों — सत्संग सूचक शकुन।
तुलसीदास जी की यह कृति प्रश्न और उत्तर की उस प्राचीन पद्धति को जीवित रखती है जिसमें रामकथा ही प्रमाण है। इस छठे सप्तक के छठा दोहे में द्वितीय सर्ग का वही भाव है जहाँ परिस्थिति बदलती है और शकुन भी उसी के अनुसार फल देता है।
मुनियों का मिलन — सत्संग प्राप्ति का सूचक शकुन।
मूल दोहा: राम लखन मुनि गन मिलन मंजुल मंगल मूल। सत समाज तब होइ जब रमा राम अनुकुल॥६॥
शब्दार्थ:
- मुनि गन = मुनिगण
- मिलन = मिलना
- मंजुल = सुंदर
- मंगल मूल = कल्याण का मूल
- सत समाज = सत्पुरुषों का संग
- तब होइ जब = तभी होता है जब
- रमा राम = श्रीराम-जानकी
- अनुकुल = अनुकूल
राम लखन मुनि गन मिलन = श्रीराम-लक्ष्मण से मुनियों का मिलन। सत समाज तब होइ जब रमा राम अनुकुल = सत्संग तभी मिलता है जब श्रीसीताराम अनुकूल हों।
भावार्थ / व्याख्या:
श्रीराम का लक्ष्मणजी के साथ मुनियों से मिलन सुंदर कल्याण का मूल है।
तुलसीदास जी एक गहरी बात कहते हैं — सत्पुरुषों का संग तभी प्राप्त होता है जब श्रीराम और जानकीजी अनुकूल हों।
यह भारतीय परंपरा का एक महत्वपूर्ण सिद्धांत है — सत्संग संयोग से नहीं, सौभाग्य से मिलता है। धन, पद या प्रयत्न से अच्छे लोगों का साथ नहीं खरीदा जा सकता। इसीलिए यह शकुन सत्संग-प्राप्ति का सूचक माना गया है, जो अपने आप में एक बड़ा आशीर्वाद है।
शकुन फल:
यह शकुन सत्संग-प्राप्ति का सूचक है। निम्नलिखित प्रश्नों में परिणाम अनुकूल रहेगा:
- गुरु, संत या सत्पुरुष की संगति
- अच्छे मित्रों या सहयोगियों का मिलना
- सत्संग, कथा या आध्यात्मिक समूह से जुड़ना
- किसी योग्य व्यक्ति से मार्गदर्शन
- भाग्य और दैवी कृपा से जुड़े प्रश्न
इस दोहे के आने पर सत्संग-प्राप्ति का शुभ संकेत मिलता है। अच्छे लोगों का साथ मिलेगा — यह श्रीसीताराम की अनुकूलता का प्रमाण है।
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