रामाज्ञा प्रश्न / द्वितीय सर्ग / सप्तक 5 / श्लोक 7
रामाज्ञा प्रश्न द्वितीय सर्ग सप्तक 5 श्लोक 7 — चित्रकूट में प्रभु का नित्य निवास; राम-नाम जप से जापक को अभीष्ट फल मिलने का शुभ शकुन।
प्रश्न पूछने की परंपरा में मन को एकाग्र कर, श्रीराम का स्मरण करते हुए सर्ग, सप्तक और दोहा — तीनों संख्याएँ चुनी जाती हैं। द्वितीय सर्ग के पाँचवें सप्तक का सातवाँ दोहा प्रस्तुत है, जिसमें अयोध्या से चित्रकूट तक की यात्रा के संकेत छिपे हैं।
चित्रकूट में नित्य निवास — जप और साधना सफल होने का शकुन।
मूल दोहा: चित्रकुट सब दीन बसत प्रभु सिय लखन समेत। राम नाम जप जापकहि तुलसी अभिमत देत॥७॥
शब्दार्थ:
- सब दीन = सर्वदा, सब दिन
- बसत = निवास करते हैं
- प्रभु = प्रभु श्रीराम
- समेत = के साथ
- जप = नाम-जप
- जापकहि = जप करने वाले को
- अभिमत = अभीष्ट, मनचाहा फल
- देत = देता है
चित्रकुट सब दीन बसत प्रभु = प्रभु सर्वदा चित्रकूट में निवास करते हैं। राम नाम जप जापकहि अभिमत देत = राम-नाम का जप जपने वाले को अभीष्ट फल देता है।
भावार्थ / व्याख्या:
प्रभु श्रीराम, श्रीजानकीजी तथा लक्ष्मणजी के साथ सर्वदा चित्रकूट में निवास करते हैं। तुलसीदास जी कहते हैं कि श्रीराम-नाम का जप, जप करने वाले को अभीष्ट फल देता है।
‘सब दीन बसत’ का भाव गहरा है — श्रीराम चित्रकूट से गए नहीं, वे आज भी वहाँ हैं। भक्त की दृष्टि में तीर्थ कभी खाली नहीं होता।
शकुन की दृष्टि से यह दोहा जप और साधना के प्रश्नों में स्पष्ट शुभ संकेत देता है। यह आश्वासन देता है कि जो साधना की जा रही है, वह व्यर्थ नहीं जाएगी — मनचाहा फल अवश्य मिलेगा।
शकुन फल:
यह शकुन जप और साधना की सफलता का सूचक है। निम्नलिखित प्रश्नों में:
- नाम-जप, मंत्र-साधना या अनुष्ठान का फल
- लंबे समय से की जा रही साधना
- तीर्थयात्रा, विशेषकर चित्रकूट
- मन की अभीष्ट कामना की पूर्ति
- धैर्यपूर्वक किए जा रहे किसी प्रयत्न का फल
इस दोहे के आने पर जप और साधना सफल होने का संकेत मिलता है। जो साधना कर रहे हैं वह व्यर्थ नहीं जाएगी — अभीष्ट फल अवश्य मिलेगा।
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