रामाज्ञा प्रश्न / द्वितीय सर्ग / सप्तक 5 / श्लोक 6
रामाज्ञा प्रश्न द्वितीय सर्ग सप्तक 5 श्लोक 6 — भरतजी के नियम, व्रत और राम-चरण प्रेम का आदर्श; साहस से कार्य करने और जप-यज्ञ सिद्ध होने का शकुन।
॥रामाज्ञा प्रश्न॥ के कुल ३४३ दोहे सात सर्गों में इस प्रकार बँटे हैं कि हर सर्ग में ४९ दोहे आते हैं। द्वितीय सर्ग के पाँचवें सप्तक का छठा दोहा प्रस्तुत है, जिसमें अयोध्या से चित्रकूट तक की यात्रा के संकेत छिपे हैं।
भरतजी के नियम-व्रत का आदर्श — साहस से कार्य आरंभ करने का शुभ शकुन।
मूल दोहा: भरत नेम ब्रत धरम सुभ राम चरन अनुराग। सगुन समुझि साहस करिय, सिद्ध होइ जप जाग॥६॥
शब्दार्थ:
- नेम = नियम
- ब्रत = व्रत
- धरम = धर्माचरण
- सुभ = शुभ
- राम चरन अनुराग = श्रीराम के चरणों में प्रेम
- समुझि = समझकर
- साहस करिय = साहसपूर्वक करो
- सिद्ध होइ = सफल होंगे
- जप जाग = जप और यज्ञ
भरत नेम ब्रत धरम सुभ = भरतजी के शुभ नियम, व्रत और धर्माचरण। सिद्ध होइ जप जाग = जप और यज्ञ सफल होंगे।
भावार्थ / व्याख्या:
श्रीभरतजी के शुभ नियम, व्रत, धर्माचरण तथा श्रीराम के चरणों में प्रेम को उत्तम शकुन समझकर साहसपूर्वक कार्य आरंभ करो — इससे जप और यज्ञ सिद्ध होंगे।
भरतजी ने चौदह वर्ष नंदिग्राम में तपस्वी की तरह बिताए। राजा होते हुए भी उन्होंने राजसी सुख नहीं भोगा। यह संयम और व्रत का सर्वोच्च उदाहरण है।
शकुन की दृष्टि से यह दोहा शुभ है। इसमें ‘साहस करिय’ अर्थात् साहस करो — यह स्पष्ट प्रोत्साहन है। संदेश यह है कि यदि आपका संकल्प शुद्ध है और नियम-संयम का पालन कर रहे हैं, तो साहस के साथ आगे बढ़ें, सफलता निश्चित है।
शकुन फल:
यह शकुन शुभ है और साहसपूर्वक कार्य आरंभ करने का संकेत देता है। निम्नलिखित प्रश्नों में:
- जप, अनुष्ठान, यज्ञ या व्रत का संकल्प
- नियम-संयम के साथ किया जाने वाला कार्य
- साहस और दृढ़ता की आवश्यकता वाला निर्णय
- लंबे समय तक चलने वाला व्रत या प्रतिज्ञा
- धर्म और मर्यादा से जुड़ा कोई कार्य
इस दोहे के आने पर उत्तम शकुन है। साहसपूर्वक कार्य आरंभ करें — जप, यज्ञ और संकल्प सभी सिद्ध होंगे। नियम और संयम बनाए रखें।
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