रामाज्ञा प्रश्न / द्वितीय सर्ग / सप्तक 4 / श्लोक 6
रामाज्ञा प्रश्न द्वितीय सर्ग सप्तक 4 श्लोक 6 — धनुष-बाण धारी लक्ष्मणजी की मूर्ति का हृदय में ध्यान; आनंद, मंगल और कल्याण का शुभ शकुन।
तुलसीदास जी की यह कृति प्रश्न और उत्तर की उस प्राचीन पद्धति को जीवित रखती है जिसमें रामकथा ही प्रमाण है। यह दोहा द्वितीय सर्ग के चौथे सप्तक में क्रम से छठा है — यहाँ वियोग, प्रतीक्षा और भरत के प्रेम के भाव मिलते हैं।
धनुष-बाण धारी लक्ष्मणजी का ध्यान — सब प्रकार से आनंद-मंगल।
मूल दोहा: ललित लखन मूरति हृदयँ आनि धरें धनु बान। करहु काज सुभ सगुन सब मुद मंगल कल्यान॥६॥
शब्दार्थ:
- ललित = सुंदर
- लखन = लक्ष्मणजी
- मूरति = मूर्ति, स्वरूप
- हृदयँ आनि = हृदय में लाकर
- धरें = धारण किए हुए
- धनु बान = धनुष-बाण
- मुद = आनंद
- कल्यान = कल्याण
ललित लखन मूरति हृदयँ आनि = लक्ष्मणजी की सुंदर मूर्ति हृदय में लाकर। मुद मंगल कल्यान = आनंद, मंगल और कल्याण होगा।
भावार्थ / व्याख्या:
धनुष-बाण लिए लक्ष्मणजी की सुंदर मूर्ति हृदय में ले आकर कार्य करो। तुलसीदास जी कहते हैं कि शकुन शुभ है और सब प्रकार से आनंद-मंगल एवं कल्याण होगा।
लक्ष्मणजी सतर्कता और रक्षा के प्रतीक हैं। वनवास के चौदह वर्षों में वे प्रायः जागते रहे और श्रीराम-सीता की रक्षा करते रहे।
शकुन की दृष्टि से यह दोहा शुभ है और विशेषकर सुरक्षा, सतर्कता और रक्षा से जुड़े प्रश्नों में अनुकूल संकेत देता है। यह बताता है कि आपकी रक्षा की व्यवस्था है — निर्भय होकर कार्य करें।
शकुन फल:
यह शकुन शुभ है और सब प्रकार के कल्याण का सूचक है। निम्नलिखित प्रश्नों में:
- सुरक्षा, बचाव या रक्षा से जुड़ा प्रश्न
- किसी की देखभाल या ज़िम्मेदारी उठाना
- भय या असुरक्षा की भावना
- छोटे भाई या अनुज से जुड़ा प्रश्न
- कोई भी शुभ कार्य आरंभ करना
इस दोहे के आने पर शकुन शुभ है और सब प्रकार से कल्याण होगा। सुरक्षा की चिंता न करें — निर्भय होकर कार्य करें।
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