रामाज्ञा प्रश्न / द्वितीय सर्ग / सप्तक 4 / श्लोक 5
रामाज्ञा प्रश्न द्वितीय सर्ग सप्तक 4 श्लोक 5 — पुण्य, शील और शोभा की सीमा श्रीजानकीजी का स्मरण; स्त्री-धर्म के लिए मंगलकारी शकुन।
जब मन किसी दुविधा में हो, तब ॥रामाज्ञा प्रश्न॥ का एक दोहा भी दिशा दिखाने के लिए पर्याप्त माना गया है। यह दोहा द्वितीय सर्ग के चौथे सप्तक में क्रम से पाँचवाँ है — यहाँ वियोग, प्रतीक्षा और भरत के प्रेम के भाव मिलते हैं।
श्रीजानकीजी का स्मरण — स्त्रियों के धर्म और सौभाग्य से जुड़ा शकुन।
मूल दोहा: सुकृत सील सोभा अवधि सीय सुमंगल खानि। सुमिरि सगुन तिय धर्म हित कहब सुमंगल जानि॥५॥
शब्दार्थ:
- सुकृत = पुण्य
- सील = शील
- सोभा = सौंदर्य
- अवधि = सीमा, पराकाष्ठा
- सुमंगल खानि = मंगल की खान
- तिय धर्म = स्त्री-धर्म, पातिव्रत धर्म
- हित = के लिए
सुकृत सील सोभा अवधि = पुण्य, शील और सौंदर्य की सीमा। तिय धर्म हित कहब सुमंगल = स्त्री-धर्म के लिए यह मंगलकारी है।
भावार्थ / व्याख्या:
श्रीजानकीजी पुण्य, शील और सौंदर्य की सीमा तथा मंगल की खान हैं — उनका स्मरण करो।
तुलसीदास जी कहते हैं कि इस शकुन को हम मंगलकारी जानकर स्त्रियों के धर्म के अनुकूल कहेंगे।
सीताजी ने वनवास, अशोक वाटिका और अग्नि-परीक्षा — सब सहा, पर अपने धर्म से विचलित नहीं हुईं। इसीलिए वे शील और धैर्य की पराकाष्ठा मानी जाती हैं। शकुन की दृष्टि से यह दोहा स्त्रियों से जुड़े प्रश्नों में और गृहस्थ धर्म से संबंधित विषयों में विशेष शुभ है।
शकुन फल:
यह शकुन स्त्रियों और गृहस्थ धर्म से जुड़े प्रश्नों में मंगलकारी है। निम्नलिखित में:
- स्त्री या गृहिणी से जुड़ा कोई प्रश्न
- वैवाहिक जीवन और दांपत्य सुख
- पत्नी, माता, बहन या पुत्री का कल्याण
- गृहस्थ जीवन के कर्तव्य और मर्यादा
- धैर्यपूर्वक कठिनाई सहने की स्थिति
इस दोहे के आने पर मंगलकारी संकेत मिलता है, विशेषकर स्त्रियों और गृहस्थ धर्म से जुड़े प्रश्नों में। धैर्य और शील ही इस समय सबसे बड़ी शक्ति है।
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