रामाज्ञा प्रश्न / द्वितीय सर्ग / सप्तक 4 / श्लोक 7
रामाज्ञा प्रश्न द्वितीय सर्ग सप्तक 4 श्लोक 7 — तुलसीदास जी का राम-नाम पर श्रीराम से भी अधिक भरोसा; सभी सुमंगलों का कोष कहा गया शकुन।
॥रामाज्ञा प्रश्न॥ पढ़ते समय दोहे का अर्थ और उसका शकुन-फल — दोनों को साथ रखकर विचार करना उचित माना गया है। यह दोहा द्वितीय सर्ग के चौथे सप्तक में क्रम से सातवाँ है — यहाँ वियोग, प्रतीक्षा और भरत के प्रेम के भाव मिलते हैं।
राम-नाम की महिमा — तुलसीदास जी का सबसे प्रसिद्ध सिद्धांत।
मूल दोहा: राम नाम पर राम ते प्रीति प्रतीति भरोस। सो तुलसी सुमिरत सकल सगुन सुमंगल कोस॥७॥
शब्दार्थ:
- राम नाम = श्रीराम का नाम
- पर = अधिक, बढ़कर
- राम ते = श्रीराम से
- प्रीति = प्रेम
- प्रतीति = विश्वास
- भरोस = भरोसा
- सुमिरत = स्मरण करने से
- सुमंगल कोस = मंगलों का कोष
राम नाम पर राम ते प्रीति प्रतीति भरोस = मेरा प्रेम, विश्वास और भरोसा श्रीराम से भी अधिक राम-नाम पर है। सगुन सुमंगल कोस = शकुन मंगलों का कोष हो जाता है।
भावार्थ / व्याख्या:
तुलसीदास जी अपना सबसे प्रसिद्ध सिद्धांत यहाँ प्रस्तुत करते हैं — मेरा प्रेम, विश्वास और भरोसा स्वयं श्रीराम से भी अधिक उनके नाम पर है।
इसका कारण भी रामचरितमानस में वे बताते हैं — श्रीराम ने अहल्या का उद्धार किया, पर नाम ने अनगिनत पापियों का उद्धार किया। श्रीराम ने एक युग में अवतार लिया, पर नाम हर युग में उपलब्ध है।
इसीलिए वे कहते हैं कि उस राम-नाम का स्मरण करने से शकुन सभी सुमंगलों का कोष बन जाता है। शकुन की दृष्टि से यह सप्तक का सर्वोच्च दोहा है — यह सभी प्रकार के प्रश्नों में मंगलमय उत्तर देता है।
शकुन फल:
यह शकुन सभी सुमंगलों का कोष है। निम्नलिखित सभी प्रश्नों में अनुकूल:
- कोई भी कार्य, कोई भी प्रश्न
- नाम-जप, साधना या भक्ति मार्ग
- ऐसी स्थिति जहाँ कोई और सहारा न हो
- लंबे समय से चली आ रही कठिनाई
- मन की शांति और आंतरिक बल की तलाश
इस दोहे के आने पर शकुन सभी सुमंगलों का कोष बन जाता है। राम-नाम का स्मरण करते रहें — यही सबसे बड़ा सहारा और सबसे बड़ी शक्ति है।
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