रामाज्ञा प्रश्न / द्वितीय सर्ग / सप्तक 2 / श्लोक 2
रामाज्ञा प्रश्न द्वितीय सर्ग सप्तक 2 श्लोक 2 — यमुना पार कर स्नान और प्रस्थान; समस्त संकटों को नष्ट करने वाला यात्रा-शकुन।
॥रामाज्ञा प्रश्न॥ तुलसीदास जी की उन रचनाओं में गिना जाता है जो भक्ति के साथ-साथ व्यावहारिक मार्गदर्शन भी देती हैं। प्रस्तुत दोहा द्वितीय सर्ग के दूसरे सप्तक में दूसरा स्थान पर है, जहाँ हर्ष और वियोग — दोनों प्रकार के प्रसंग आते हैं।
यमुना पार कर आगे प्रस्थान — यात्रा के लिए उत्तम फल।
मूल दोहा: सीता लखन समेत प्रभु, जमुना उतरि नहाइ। चले सकल संकट समन सगुन सुमंगल पाइ॥२॥
शब्दार्थ:
- समेत = के साथ
- जमुना = यमुनाजी
- उतरि = पार उतरकर
- नहाइ = स्नान करके
- सकल संकट समन = समस्त संकटों को नष्ट करने वाला
- सगुन = शकुन
- पाइ = पाकर
जमुना उतरि नहाइ = यमुनाजी पार उतरकर स्नान करके। सकल संकट समन = समस्त संकटों को नष्ट करने वाला शकुन।
भावार्थ / व्याख्या:
श्रीसीताजी और लक्ष्मणजी के साथ प्रभु श्रीराम यमुनाजी के पार उतरकर, स्नान करके, समस्त संकटों को नष्ट करने वाला मंगलमय शकुन पाकर आगे चले।
नदी पार करना जीवन में एक बाधा को पार करने का प्रतीक है। यह दोहा बताता है कि जो कठिनाई सामने खड़ी दिख रही है, वह पार हो जाएगी।
शकुन की दृष्टि से यह दोहा यात्रा के लिए उत्तम फल सूचित करता है। साथ ही ‘सकल संकट समन’ शब्द बताते हैं कि यह केवल यात्रा नहीं, सभी प्रकार के संकटों के निवारण का संकेत है — एक बाधा पार होने पर आगे का मार्ग खुलेगा।
शकुन फल:
यह शकुन यात्रा के लिए उत्तम फल सूचित करता है। निम्नलिखित प्रश्नों में:
- यात्रा, प्रस्थान या स्थान परिवर्तन
- किसी बड़ी बाधा या रुकावट को पार करना
- नदी, समुद्र या जल-मार्ग से यात्रा
- विदेश गमन या दूर के स्थान पर जाना
- संकट से निकलकर नई शुरुआत
इस दोहे के आने पर यात्रा के लिए उत्तम फल सूचित होता है। सामने खड़ी बाधा पार होगी और आगे का मार्ग खुलेगा। निश्चिंत होकर प्रस्थान करें।
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