रामाज्ञा प्रश्न / द्वितीय सर्ग / सप्तक 2 / श्लोक 3
रामाज्ञा प्रश्न द्वितीय सर्ग सप्तक 2 श्लोक 3 — श्रीराम के बिना अयोध्यावासियों का शोक और विलाप; यह शकुन अनिष्ट सूचित करता है।
शकुन शुभ है या अशुभ — यह निर्णय ॥रामाज्ञा प्रश्न॥ में उसी प्रसंग से होता है जो चुने हुए दोहे में वर्णित है। प्रस्तुत दोहा द्वितीय सर्ग के दूसरे सप्तक में तीसरा स्थान पर है, जहाँ हर्ष और वियोग — दोनों प्रकार के प्रसंग आते हैं।
अयोध्या का शोक — यह प्रश्न-फल अनिष्ट है।
मूल दोहा: अवध सोक संताप बस बिकल सकल नर नारि। बाम बिधाता राम बिनु माँगत मीचु पुकारि॥३॥
शब्दार्थ:
- अवध = अयोध्या
- सोक संताप = शोक और संताप
- बिकल = व्याकुल
- नर नारि = स्त्री-पुरुष
- बाम बिधाता = प्रतिकूल विधाता
- राम बिनु = श्रीराम के बिना
- माँगत मीचु = मृत्यु माँगते हैं
- पुकारि = पुकार कर
बिकल सकल नर नारि = सभी स्त्री-पुरुष व्याकुल हैं। माँगत मीचु पुकारि = पुकार कर मृत्यु माँगते हैं।
भावार्थ / व्याख्या:
अयोध्या में सभी नर-नारी श्रीराम के बिना शोक और संताप के कारण व्याकुल होकर, प्रतिकूल हुए विधाता से पुकार-पुकार कर मृत्यु माँगते हैं।
यह वियोग की पराकाष्ठा है। जब कोई प्रिय व्यक्ति चला जाए और लौटने की कोई आशा न बचे, तब मनुष्य की यही दशा होती है।
शकुन की दृष्टि से यह दोहा स्पष्ट रूप से अनिष्ट सूचक है। यह वियोग, बिछोह और गहरे मानसिक कष्ट का संकेत देता है। ऐसे समय में कोई महत्वपूर्ण निर्णय नहीं लेना चाहिए, क्योंकि मन शोक से भरा होने पर विवेक काम नहीं करता।
शकुन फल:
यह शकुन अनिष्ट सूचित करता है। निम्नलिखित प्रश्नों में विशेष सावधानी:
- किसी प्रिय से बिछड़ने या दूर जाने की स्थिति
- पारिवारिक वियोग या अलगाव
- किसी की वापसी की प्रतीक्षा
- गहरे मानसिक तनाव या दुःख की स्थिति
- शोकावस्था में लिया जा रहा कोई निर्णय
इस दोहे के आने पर प्रश्न-फल अनिष्ट है। इस समय कोई बड़ा निर्णय न लें। अपने निकट लोगों का सहारा लें और समय को बदलने दें — रामायण में भी यह वियोग अंततः मिलन में बदला था।
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