रामाज्ञा प्रश्न / प्रथम सर्ग / सप्तक 3 / श्लोक 4
रामाज्ञा प्रश्न प्रथम सर्ग सप्तक 3 श्लोक 4 — विश्वामित्रजी के साथ राम-लक्ष्मण के प्रयाण का स्मरण; यश, विजय और धन-लाभ का प्रामाणिक शकुन।
इस ग्रंथ की विशेषता यह है कि प्रत्येक दोहा रामकथा का एक प्रसंग भी है और प्रश्न का फल भी। प्रथम सर्ग के तीसरे सप्तक का यह चौथा दोहा शुभारंभ, यात्रा और धर्म-कार्य से जुड़े प्रश्नों में विशेष रूप से देखा जाता है।
यह दोहा यात्रा, विजय और धन-लाभ का प्रामाणिक शुभ शकुन है।
मूल दोहा: राम लखनु कौसिक सहित सुमिरहु करहु पयान। लच्छि लाभ जय जगत जसु, मंगल सगुन प्रमान॥४॥
शब्दार्थ:
- कौसिक = विश्वामित्रजी
- सहित = के साथ
- सुमिरहु = स्मरण करो
- पयान = प्रयाण, यात्रा
- लच्छि = लक्ष्मी, धन
- जय = विजय
- जगत जसु = संसार में यश
- प्रमान = प्रामाणिक, प्रमाणित
सुमिरहु करहु पयान = स्मरण करके यात्रा आरंभ करो। मंगल सगुन प्रमान = यह प्रामाणिक मंगल शकुन है।
भावार्थ / व्याख्या:
यह दोहा उस प्रसंग की ओर संकेत करता है जब श्रीराम और लक्ष्मण विश्वामित्रजी के साथ यज्ञ-रक्षा के लिए यात्रा पर निकले थे।
तुलसीदास जी कहते हैं कि इस प्रसंग का स्मरण करके यात्रा करो। इससे तीन फल मिलेंगे — संसार में सुयश, विजय और धन की प्राप्ति।
‘प्रमान’ शब्द विशेष है। तुलसीदास जी इसे केवल शकुन नहीं, बल्कि प्रामाणिक अर्थात् प्रमाणित और भरोसेमंद शकुन कहते हैं। यह उनका दृढ़ आश्वासन है कि इस दोहे का फल संदेहरहित है।
शकुन फल:
यह शकुन प्रामाणिक और शुभ है। निम्नलिखित प्रश्नों में परिणाम उत्तम रहेगा:
- यात्रा या प्रस्थान, विशेषकर कार्यवश
- किसी बड़े या अनुभवी व्यक्ति के साथ कार्य
- प्रतियोगिता, मुकदमा या विवाद में विजय
- धन-लाभ, निवेश या नई आय का स्रोत
- नाम, यश और प्रतिष्ठा से जुड़े प्रश्न
इस दोहे के आने पर प्रश्न-फल शुभ है। यात्रा सफल होगी, विजय मिलेगी और धन तथा यश दोनों की प्राप्ति होगी। किसी अनुभवी मार्गदर्शक का साथ लें तो और उत्तम।
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