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रामाज्ञा प्रश्न / प्रथम सर्ग / सप्तक 3 / श्लोक 5

रामाज्ञा प्रश्न प्रथम सर्ग सप्तक 3 श्लोक 5 — मुनि-यज्ञ के रक्षक श्रीराम के चरण-स्मरण से चिंता और संकट दूर होने का शुभ शकुन।

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तुलसीदास जी ने ॥रामाज्ञा प्रश्न॥ की रचना उनके लिए की जो किसी निर्णय पर पहुँचने से पहले प्रभु का संकेत जान लेना चाहते हैं। प्रथम सर्ग के तीसरे सप्तक का यह पाँचवाँ दोहा शुभारंभ, यात्रा और धर्म-कार्य से जुड़े प्रश्नों में विशेष रूप से देखा जाता है।

यह दोहा संकट और चिंता से मुक्ति का स्पष्ट आश्वासन देता है।

मूल दोहा: मुनिमखपाल कृपाल प्रभु चरनकमल उर आनु। तजहु सोच, संकट मिटिहि, सत्य सगुन जियँ जानु॥५॥

शब्दार्थ:

  • मुनिमखपाल = मुनि के यज्ञ की रक्षा करने वाले (श्रीराम)
  • कृपाल = कृपालु
  • चरनकमल = चरण-कमल
  • उर आनु = हृदय में ले आओ
  • तजहु सोच = चिंता छोड़ दो
  • मिटिहि = मिट जाएगा
  • जियँ जानु = मन में सत्य समझो

तजहु सोच, संकट मिटिहि = चिंता छोड़ दो, संकट मिट जाएगा। सत्य सगुन जियँ जानु = इस शकुन को मन में सत्य समझो।

भावार्थ / व्याख्या:

मुनि विश्वामित्रजी के यज्ञ की रक्षा करने वाले प्रभु श्रीराम के चरण-कमलों को हृदय में धारण करो — यह इस दोहे का पहला निर्देश है।

इसके बाद तुलसीदास जी बहुत सीधा और आश्वस्त करने वाला वचन देते हैं: ‘तजहु सोच, संकट मिटिहि’ — चिंता छोड़ दो, संकट अपने आप दूर हो जाएगा। और फिर जोड़ते हैं — इस शकुन को मन में सत्य समझो।

यह दोहा उन प्रश्नकर्ताओं के लिए है जो किसी संकट, भय या अनिश्चितता से गुज़र रहे हैं। जिस प्रकार श्रीराम ने मुनि के यज्ञ की रक्षा राक्षसों से की, उसी प्रकार वे शरणागत की रक्षा करेंगे — यह इस दोहे का मूल संदेश है।

शकुन फल:

यह शकुन संकट-निवारण का स्पष्ट सूचक है। निम्नलिखित प्रश्नों में स्थिति सुधरेगी:

  • किसी संकट, विपत्ति या कठिनाई से मुक्ति
  • लंबे समय से चली आ रही चिंता या तनाव
  • मुकदमा, विवाद या कानूनी उलझन
  • आर्थिक संकट या कर्ज़ की समस्या
  • शत्रु, विरोधी या बाधक से मिलने वाला भय

इस दोहे के आने पर विपत्ति दूर होने का स्पष्ट संकेत मिलता है। चिंता छोड़ें — जिस समस्या को लेकर प्रश्न पूछा है, वह हल होगी। धैर्य रखें और श्रीराम के चरणों का स्मरण करते रहें।

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