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रामाज्ञा प्रश्न / प्रथम सर्ग / सप्तक 2 / श्लोक 5

रामाज्ञा प्रश्न प्रथम सर्ग सप्तक 2 श्लोक 5 — पुत्रेष्टि यज्ञ का प्रसाद और ब्राह्मणों का आशीर्वाद सब मंगलों का मूल; उत्तम शकुन फल।

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जब मन किसी दुविधा में हो, तब ॥रामाज्ञा प्रश्न॥ का एक दोहा भी दिशा दिखाने के लिए पर्याप्त माना गया है। प्रस्तुत दोहा प्रथम सर्ग के दूसरे सप्तक में पाँचवाँ स्थान पर आता है, जहाँ श्रीराम की महिमा और कार्य-सिद्धि के संकेत मिलते हैं।

यह दोहा पुत्रेष्टि यज्ञ और ब्राह्मणों के आशीर्वाद की महिमा बताता है।

मूल दोहा: पुत्र जागु करवाइ रिषि राजहि दीन्ह प्रसाद। सकल सुमंगल मूल जग भूसुर आसिरबाद॥५॥

शब्दार्थ:

  • पुत्र जागु = पुत्रेष्टि यज्ञ
  • करवाइ = करवाकर
  • रिषि = ऋषि (वसिष्ठजी)
  • राजहि = राजा को
  • प्रसाद = यज्ञ का प्रसाद (चरु)
  • सकल सुमंगल मूल = सभी श्रेष्ठ मंगलों की जड़
  • भूसुर = भूदेव, ब्राह्मण
  • आसिरबाद = आशीर्वाद

रिषि राजहि दीन्ह प्रसाद = ऋषि ने राजा को प्रसाद दिया। भूसुर आसिरबाद = ब्राह्मणों का आशीर्वाद सब मंगलों का मूल है।

भावार्थ / व्याख्या:

महर्षि वसिष्ठजी ने पुत्रेष्टि यज्ञ करवाकर महाराज दशरथ को यज्ञ का प्रसाद दिया, जिसे रानियों में बाँटा गया और जिससे चारों भाइयों का जन्म हुआ।

तुलसीदास जी इस प्रसंग से एक बड़ा सिद्धांत निकालते हैं — ब्राह्मणों अर्थात् सत्पुरुषों का आशीर्वाद संसार में सभी श्रेष्ठ मंगलों का मूल है। जिस प्रकार वृक्ष की जड़ दिखाई नहीं देती पर सारा वृक्ष उसी पर टिका होता है, उसी प्रकार आशीर्वाद अदृश्य होता है पर सारी सफलता उसी पर आधारित होती है।

इसलिए यह दोहा उन प्रश्नों में विशेष शुभ है जहाँ अनुष्ठान, यज्ञ, दान या किसी सत्पुरुष का आशीर्वाद प्रश्न का विषय हो।

शकुन फल:

यह शकुन उत्तम फल का सूचक है। निम्नलिखित प्रश्नों में परिणाम शुभ रहेगा:

  • यज्ञ, अनुष्ठान, हवन या पूजा का फल
  • संतान प्राप्ति और वंश-वृद्धि
  • दान, सेवा या धर्मकार्य का परिणाम
  • गुरु या सत्पुरुष से आशीर्वाद प्राप्ति
  • लंबे समय से चल रहे प्रयत्न का फल मिलना

इस दोहे के आने पर प्रश्न-फल उत्तम है। किया गया प्रयत्न व्यर्थ नहीं जाएगा। यज्ञ, दान या सेवा का कोई कार्य साथ में करें तो फल और शीघ्र मिलेगा।

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