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रामाज्ञा प्रश्न / प्रथम सर्ग / सप्तक 2 / श्लोक 4

रामाज्ञा प्रश्न प्रथम सर्ग सप्तक 2 श्लोक 4 — दशरथ की संतान हेतु प्रार्थना और वसिष्ठजी का आश्वासन; संतान-प्राप्ति का शुभ शकुन।

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सात सर्ग, प्रत्येक सर्ग में सात सप्तक और प्रत्येक सप्तक में सात दोहे — यही ॥रामाज्ञा प्रश्न॥ की सरल किंतु सुगठित संरचना है। प्रस्तुत दोहा प्रथम सर्ग के दूसरे सप्तक में चौथा स्थान पर आता है, जहाँ श्रीराम की महिमा और कार्य-सिद्धि के संकेत मिलते हैं।

यह दोहा संतान-प्राप्ति संबंधी प्रश्नों के लिए विशेष शुभ माना गया है।

मूल दोहा: सुतहित बिनती कीन्ह नृप, कुलगुरु कहा उपाउ। होइहि भल संतान सुनि प्रमुदित कोसल राउ॥४॥

शब्दार्थ:

  • सुतहित = पुत्र के लिए, संतान के हित
  • बिनती = प्रार्थना, विनती
  • नृप = राजा (महाराज दशरथ)
  • कुलगुरु = कुल के गुरु (वसिष्ठजी)
  • उपाउ = उपाय
  • होइहि = होगी
  • कोसल राउ = कोसलराज (महाराज दशरथ)

कुलगुरु कहा उपाउ = कुलगुरु वसिष्ठजी ने उपाय बताया। प्रमुदित कोसल राउ = महाराज दशरथ अत्यंत प्रसन्न हुए।

भावार्थ / व्याख्या:

महाराज दशरथ ने संतान-प्राप्ति के लिए प्रार्थना की। उनके कुलगुरु वसिष्ठजी ने उसका उपाय बताया और आश्वासन दिया कि अच्छी संतान अवश्य उत्पन्न होगी।

यह सुनकर महाराज दशरथ अत्यंत प्रसन्न हुए। इस दोहे में एक सुंदर क्रम है — पहले विनम्र प्रार्थना, फिर गुरु का मार्गदर्शन, फिर आश्वासन, और अंत में प्रसन्नता।

यही क्रम शकुन में भी लागू होता है। जो व्यक्ति अहंकार छोड़कर प्रार्थना करता है और योग्य मार्गदर्शक की बात मानता है, उसकी मनोकामना पूर्ण होती है। इसीलिए यह दोहा संतान संबंधी प्रश्नों में सर्वाधिक शुभ माना गया है।

शकुन फल:

यह शकुन संतान-प्राप्ति संबंधी प्रश्नों में विशेष शुभ है। निम्नलिखित विषयों में सफलता होगी:

  • संतान प्राप्ति या पुत्र-पुत्री संबंधी प्रश्न
  • संतान के स्वास्थ्य, शिक्षा या भविष्य की चिंता
  • लंबे समय से रुकी हुई मनोकामना की पूर्ति
  • गुरु या विशेषज्ञ की सलाह लेने का निर्णय
  • पूजा, अनुष्ठान या मन्नत का फल

इस दोहे के आने पर मनोकामना पूर्ण होने का शुभ संकेत मिलता है, विशेषकर संतान से जुड़े प्रश्नों में। योग्य मार्गदर्शक की सलाह लें और धैर्य के साथ प्रयत्न जारी रखें।

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