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रामाज्ञा प्रश्न / सप्तम सर्ग / सप्तक 6 / श्लोक 6

रामाज्ञा प्रश्न सप्तम सर्ग सप्तक 6 श्लोक 6 — राम-सीता-लक्ष्मण का वन-वास और नगरवासियों का वियोग; सुख-दुःख कर्म के अधीन होने का शकुन।

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तुलसीदास जी की यह कृति प्रश्न और उत्तर की उस प्राचीन पद्धति को जीवित रखती है जिसमें रामकथा ही प्रमाण है। इस छठे सप्तक के छठा दोहे में सप्तम सर्ग का वह भाव है जो कहता है — प्रश्न के अनुरूप आया दोहा ही सत्य उत्तर है।

वन-वास और वियोग — सुख-दुःख, योग-वियोग कर्म के अधीन।

मूल दोहा: लषन राम सिय बसत बन, बिरह बिकल पुर लोग। समय सगुन कह करम बस, दुख सुख जोग बियोग॥६॥

शब्दार्थ:

  • बसत बन = वन में रहते हैं
  • बिरह बिकल = वियोग से व्याकुल
  • पुर लोग = नगरवासी
  • समय सगुन = इस समय का शकुन
  • कह = कहता है
  • करम बस = कर्म के वश
  • दुख सुख = दुःख और सुख
  • जोग बियोग = मिलन और वियोग

लषन राम सिय बसत बन, बिरह बिकल पुर लोग = राम, सीता, लक्ष्मण वन में रहते हैं और नगरवासी वियोग से व्याकुल हैं। दुख सुख जोग बियोग = दुःख-सुख और मिलन-वियोग कर्म के अधीन हैं।

भावार्थ / व्याख्या:

श्रीलक्ष्मण, श्रीराम और सीताजी वन में निवास कर रहे हैं और नगरवासी वियोग से व्याकुल हैं।

तुलसीदास जी इस समय का शकुन बताते हैं — दुःख और सुख, मिलन और वियोग सब कर्म के अधीन हैं।

यह जीवन का सबसे संतुलित दर्शन है। न सुख स्थायी है, न दुःख; न मिलन स्थायी है, न वियोग। शकुन की दृष्टि से यह दोहा मिश्रित है — यह न आशा देता है, न निराशा, बल्कि स्वीकार-भाव सिखाता है। जो हो रहा है उसे कर्म का फल समझकर स्वीकार करें, इससे मन शांत रहेगा।

शकुन फल:

यह शकुन बताता है कि सुख-दुःख और मिलन-वियोग कर्म के अधीन हैं। निम्नलिखित प्रश्नों में:

  • किसी से बिछड़ने या दूर रहने की स्थिति
  • सुख-दुःख के उतार-चढ़ाव का दौर
  • परिस्थिति को स्वीकार करने की आवश्यकता
  • लंबे समय तक चलने वाला वियोग
  • मन की शांति और स्वीकार-भाव

इस दोहे के आने पर स्वीकार-भाव ही मार्ग है। जो हो रहा है उसे कर्म का फल समझें — न सुख स्थायी है, न दुःख। समय बदलेगा।

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