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रामाज्ञा प्रश्न / सप्तम सर्ग / सप्तक 6 / श्लोक 5

रामाज्ञा प्रश्न सप्तम सर्ग सप्तक 6 श्लोक 5 — राम-वियोग में दशरथ का दुःख और कैकेयी के कटु वचन; कुसमय में केवल कर्म-विपाक शेष का शकुन।

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जब मन किसी दुविधा में हो, तब ॥रामाज्ञा प्रश्न॥ का एक दोहा भी दिशा दिखाने के लिए पर्याप्त माना गया है। इस छठे सप्तक के पाँचवाँ दोहे में सप्तम सर्ग का वह भाव है जो कहता है — प्रश्न के अनुरूप आया दोहा ही सत्य उत्तर है।

कुसमय में सारे उपाय व्यर्थ — केवल कर्म-विपाक शेष।

मूल दोहा: राम बिरह दसरथ दुखित, कहति कैकई काकु। कुसमय जाय उपाय सब, केवल करम बिपाकु॥५॥

शब्दार्थ:

  • राम बिरह = राम के वियोग में
  • दसरथ दुखित = दशरथजी दुःखी
  • कहति कैकई काकु = कैकेयी व्यंग्य से कहती है
  • कुसमय = बुरा समय
  • जाय उपाय सब = सारे उपाय व्यर्थ जाते हैं
  • केवल = केवल
  • करम बिपाकु = कर्मों का परिपाक

राम बिरह दसरथ दुखित, कहति कैकई काकु = राम-वियोग में दशरथजी दुःखी हैं और कैकेयी व्यंग्य से बोलती है। कुसमय जाय उपाय सब, केवल करम बिपाकु = कुसमय में सारे उपाय व्यर्थ जाते हैं, केवल कर्म-विपाक शेष रहता है।

भावार्थ / व्याख्या:

श्रीराम के वियोग में महाराज दशरथ अत्यंत दुःखी हैं और कैकेयी व्यंग्यपूर्ण वचन कह रही है।

तुलसीदास जी इससे एक कठोर सत्य निकालते हैं — कुसमय में सारे उपाय व्यर्थ चले जाते हैं और केवल कर्मों का परिपाक शेष रहता है।

‘करम बिपाकु’ अर्थात् कर्मों का पकना। जैसे फल समय पर ही पकता है, वैसे ही कर्म भी अपने समय पर फल देते हैं और उसे टाला नहीं जा सकता। शकुन की दृष्टि से यह दोहा अशुभ है और बताता है कि इस समय प्रयत्न से अधिक धैर्य आवश्यक है।

शकुन फल:

यह शकुन कुसमय और कर्म-विपाक का सूचक है। निम्नलिखित प्रश्नों में:

  • ऐसी स्थिति जहाँ सारे उपाय विफल हो रहे हों
  • किसी के व्यंग्य या कटु वचन सहना
  • पुराने कर्मों का फल भोगने का समय
  • वियोग या शोक की कठिन अवस्था
  • प्रयत्न करें या धैर्य रखें — इस दुविधा में

इस दोहे के आने पर उपायों से अधिक धैर्य काम आएगा। यह कर्म-विपाक का समय है — इसे शांति से बीतने दें, फिर नया प्रयत्न करें।

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