रामाज्ञा प्रश्न / पंचम सर्ग / सप्तक 4 / श्लोक 6
रामाज्ञा प्रश्न पंचम सर्ग सप्तक 4 श्लोक 6 — लक्ष्मणजी के चरण-स्मरण से विजय, ऐश्वर्य, कीर्ति, कुशल और अभीष्ट लाभ का शकुन।
तुलसीदास जी की यह कृति प्रश्न और उत्तर की उस प्राचीन पद्धति को जीवित रखती है जिसमें रामकथा ही प्रमाण है। यह दोहा पंचम सर्ग के चौथे सप्तक में क्रम से छठा है — यहाँ भक्ति, बल और बुद्धि तीनों का संयोग है।
लक्ष्मणजी के चरण-स्मरण से विजय, ऐश्वर्य, कीर्ति और अभीष्ट।
मूल दोहा: लछिमन पद पंकज सुमिरि, सगुन सुमंगल पाइ। जय बिभूति कीरति कुसल अभिमत लाभु अघाइ॥६॥
शब्दार्थ:
- लछिमन = लक्ष्मणजी
- पद पंकज = चरण-कमल
- सुमिरि = स्मरण करके
- जय = विजय
- बिभूति = ऐश्वर्य
- कीरति = कीर्ति
- कुसल = कुशलता
- अभिमत लाभु = अभीष्ट की प्राप्ति
- अघाइ = भरपूर
लछिमन पद पंकज सुमिरि, सगुन सुमंगल पाइ = लक्ष्मणजी के चरण-कमलों का स्मरण करके मंगलकारी शकुन पाने पर। जय बिभूति कीरति कुसल अभिमत लाभु अघाइ = विजय, ऐश्वर्य, कीर्ति, कुशल और अभीष्ट भरपूर मिलेगा।
भावार्थ / व्याख्या:
श्रीलक्ष्मणजी के चरण-कमलों का स्मरण करो। यह परम मंगलकारी शकुन पा लेने पर विजय, ऐश्वर्य, कीर्ति, कुशल तथा अभीष्ट की प्राप्ति भरपूर होगी।
इस एक ही दोहे में पाँच फल गिनाए गए हैं — विजय, ऐश्वर्य, कीर्ति, कुशलता और मनोवांछित प्राप्ति। और अंत में ‘अघाइ’ अर्थात् भरपूर, तृप्ति तक।
शकुन की दृष्टि से यह पंचम सर्ग के सर्वाधिक व्यापक फल वाले दोहों में से एक है। यह लगभग हर प्रकार के प्रश्न में अनुकूल उत्तर देता है — भौतिक भी और यश-संबंधी भी।
शकुन फल:
यह परम मंगलकारी शकुन पाँच फलों का सूचक है। निम्नलिखित प्रश्नों में:
- प्रतियोगिता, मुकदमा या संघर्ष में विजय
- धन, ऐश्वर्य और समृद्धि
- नाम, यश और प्रतिष्ठा
- स्वास्थ्य और कुशलता
- कोई भी मनोवांछित इच्छा की पूर्ति
इस दोहे के आने पर विजय, ऐश्वर्य, कीर्ति, कुशल और अभीष्ट — पाँचों भरपूर मिलेंगे। यह अत्यंत व्यापक शुभ फल है।
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