रामाज्ञा प्रश्न / पंचम सर्ग / सप्तक 1 / श्लोक 7
रामाज्ञा प्रश्न पंचम सर्ग सप्तक 1 श्लोक 7 — प्रभु के प्रताप को जहाज बनाकर हनुमानजी का समुद्र-लंघन; श्रेष्ठ प्रश्न-फल।
प्रश्न पूछने की परंपरा में मन को एकाग्र कर, श्रीराम का स्मरण करते हुए सर्ग, सप्तक और दोहा — तीनों संख्याएँ चुनी जाती हैं। यह पहले सप्तक का सातवाँ दोहा है। पंचम सर्ग हनुमानजी के समुद्र-लंघन से लेकर रावण-वध तक के पराक्रम का सर्ग है।
समुद्र-लंघन — प्रभु का प्रताप ही जहाज, प्रश्न-फल श्रेष्ठ है।
मूल दोहा: हरषि सुमन बरषत बिबुध, सगुन सुमंगल होत। तुलसी प्रभु लंघेउ जलधि प्रभु प्रताप करि पोत॥७॥
शब्दार्थ:
- हरषि = प्रसन्न होकर
- सुमन बरषत = पुष्प-वर्षा करते हैं
- बिबुध = देवता
- प्रभु = हनुमानजी (तुलसीदास के स्वामी)
- लंघेउ = लाँघ गए
- जलधि = समुद्र
- प्रभु प्रताप = श्रीराम का प्रताप
- करि पोत = जहाज बनाकर
हरषि सुमन बरषत बिबुध = देवता प्रसन्न होकर पुष्प-वर्षा कर रहे हैं। प्रभु लंघेउ जलधि प्रभु प्रताप करि पोत = श्रीराम के प्रताप को जहाज बनाकर समुद्र लाँघ गए।
भावार्थ / व्याख्या:
देवता प्रसन्न होकर पुष्प-वर्षा कर रहे हैं और श्रेष्ठ मंगलकारी शकुन हो रहे हैं। तुलसीदास जी के स्वामी हनुमानजी श्रीराम के प्रताप को जहाज बनाकर समुद्र लाँघ गए।
‘प्रभु प्रताप करि पोत’ अत्यंत सुंदर पद है। हनुमानजी के पास कोई नाव नहीं थी — उन्होंने श्रीराम के प्रताप को ही अपना जहाज बना लिया।
तुलसीदास जी इस प्रश्न-फल को ‘श्रेष्ठ’ कहते हैं। शकुन की दृष्टि से यह दोहा उन प्रश्नों में सर्वाधिक अनुकूल है जहाँ किसी बहुत बड़ी बाधा को पार करना विषय हो। यह पूर्ण सफलता का आश्वासन देता है।
शकुन फल:
यह प्रश्न-फल श्रेष्ठ है। निम्नलिखित प्रश्नों में परिणाम अत्यंत अनुकूल:
- बहुत बड़ी बाधा या चुनौती को पार करना
- समुद्र, विदेश या दूर की यात्रा
- असंभव लगने वाला कार्य पूरा करना
- बिना पर्याप्त साधन के बड़ा लक्ष्य
- श्रद्धा और आत्मविश्वास से मिलने वाली सफलता
इस दोहे के आने पर प्रश्न-फल श्रेष्ठ है। साधन कम हों तो भी चिंता न करें — श्रद्धा ही आपका जहाज बनेगी। बाधा अवश्य पार होगी।
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