रामाज्ञा प्रश्न / पंचम सर्ग / सप्तक 1 / श्लोक 5
रामाज्ञा प्रश्न पंचम सर्ग सप्तक 1 श्लोक 5 — हनुमानजी का ‘राम कृपा से समुद्र गोपद समान’ उद्घोष; कठिनाई दूर होने का शुभ शकुन।
तुलसीदास जी ने ॥रामाज्ञा प्रश्न॥ की रचना उनके लिए की जो किसी निर्णय पर पहुँचने से पहले प्रभु का संकेत जान लेना चाहते हैं। यह पहले सप्तक का पाँचवाँ दोहा है। पंचम सर्ग हनुमानजी के समुद्र-लंघन से लेकर रावण-वध तक के पराक्रम का सर्ग है।
समुद्र गोपद के समान — कठिनाई दूर होगी।
मूल दोहा: कहत उछाहु बढ़ाइ कपि साथी सकल प्रबोधि। लागत राम प्रसाद मोहि गोपद सरिस पयोधि॥५॥
शब्दार्थ:
- उछाहु बढ़ाइ = उत्साह बढ़ाते हुए
- साथी सकल = सभी साथी
- प्रबोधि = आश्वासन देकर
- राम प्रसाद = श्रीराम की कृपा से
- मोहि = मुझे
- गोपद = गाय के खुर से बना गड्ढा
- सरिस = के समान
- पयोधि = समुद्र
कहत उछाहु बढ़ाइ कपि साथी सकल प्रबोधि = साथियों का उत्साह बढ़ाते हुए हनुमानजी कहते हैं। लागत राम प्रसाद मोहि गोपद सरिस पयोधि = श्रीराम की कृपा से समुद्र मुझे गोपद के समान लगता है।
भावार्थ / व्याख्या:
सभी साथियों को आश्वासन देकर उनका उत्साह बढ़ाते हुए हनुमानजी कहते हैं — ‘श्रीराम की कृपा से समुद्र मुझे गाय के खुर से बने गड्ढे के समान लगता है।’
यह भारतीय साहित्य का सबसे प्रसिद्ध आत्मविश्वास-वाक्य है। जो समुद्र सबको अपार लग रहा था, वह हनुमानजी को एक छोटे गड्ढे जैसा लगा।
ध्यान दीजिए — उन्होंने कहा ‘राम प्रसाद’, अपने बल का अहंकार नहीं किया। तुलसीदास जी कहते हैं कि यह प्रश्न-फल शुभ है और कठिनाई दूर होगी। शकुन की दृष्टि से यह दोहा उन प्रश्नों में विशेष अनुकूल है जहाँ कोई बाधा असंभव लग रही हो।
शकुन फल:
यह प्रश्न-फल शुभ है — कठिनाई दूर होगी। निम्नलिखित प्रश्नों में:
- कोई असंभव या अपार लगने वाली बाधा
- आत्मविश्वास की आवश्यकता वाला कार्य
- दूसरों का उत्साह बढ़ाना या नेतृत्व करना
- बड़ी चुनौती स्वीकार करने का निर्णय
- लंबे समय से डरा रही समस्या
इस दोहे के आने पर कठिनाई दूर होगी। जो बाधा समुद्र जैसी लग रही है, वह गोपद जैसी छोटी सिद्ध होगी। श्रद्धा के साथ आगे बढ़ें।
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