रामाज्ञा प्रश्न / पंचम सर्ग / सप्तक 1 / श्लोक 3
रामाज्ञा प्रश्न पंचम सर्ग सप्तक 1 श्लोक 3 — जाम्बवानजी की ललकार से हनुमानजी को बल-स्मरण; साहस करने और हार न मानने का शकुन।
शकुन-विचार के लिए भक्तजन सदियों से ॥रामाज्ञा प्रश्न॥ का सहारा लेते आए हैं — श्रद्धापूर्वक चुनी गई संख्या ही उत्तर तक पहुँचाती है। यह पहले सप्तक का तीसरा दोहा है। पंचम सर्ग हनुमानजी के समुद्र-लंघन से लेकर रावण-वध तक के पराक्रम का सर्ग है।
जाम्बवानजी की ललकार — साहस करो, हार मत मानो।
मूल दोहा: जामवंत हनुमान बलु कहा पचारि पचारि। राम सुमिरि साहसु करिय, मानिय हिएँ न हारि॥३॥
शब्दार्थ:
- जामवंत = जाम्बवानजी
- बलु = बल
- कहा = वर्णन किया
- पचारि पचारि = बार-बार ललकार कर
- साहसु करिय = साहस करो
- मानिय = मानो
- हिएँ = हृदय में
- न हारि = हार मत
जामवंत हनुमान बलु कहा पचारि पचारि = जाम्बवानजी ने बार-बार ललकार कर हनुमानजी के बल का वर्णन किया। मानिय हिएँ न हारि = हृदय में हार मत मानो।
भावार्थ / व्याख्या:
जाम्बवानजी ने बार-बार ललकार कर हनुमानजी के बल का वर्णन किया। हनुमानजी अपनी शक्ति भूल चुके थे — शाप के कारण। जाम्बवानजी ने उन्हें उनकी अपनी शक्ति याद दिलाई।
तुलसीदास जी इसका शकुन-फल एक सीधे आदेश के रूप में देते हैं — श्रीराम का स्मरण करके साहस करो और हृदय में हार मत मानो।
यह दोहा उन प्रश्नकर्ताओं के लिए है जो अपनी क्षमता पर संदेह कर रहे हैं। शकुन की दृष्टि से इसका संदेश स्पष्ट है — आपके पास वह शक्ति पहले से है, बस आपको उसका स्मरण नहीं। किसी शुभचिंतक की बात सुनें जो आपको आपकी योग्यता याद दिलाए।
शकुन फल:
यह शकुन साहस करने और हार न मानने का संदेश देता है। निम्नलिखित प्रश्नों में:
- अपनी क्षमता पर संदेह की स्थिति
- हार मान लेने या पीछे हटने का विचार
- किसी शुभचिंतक की सलाह या प्रोत्साहन
- भूली हुई योग्यता या क्षमता का स्मरण
- बड़ी चुनौती के सामने आत्मविश्वास की कमी
इस दोहे के आने पर संदेश स्पष्ट है — साहस करें, हार न मानें। जो शक्ति चाहिए वह आपके पास पहले से है, बस उसे पहचानें।
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