रामाज्ञा प्रश्न / पंचम सर्ग / सप्तक 1 / श्लोक 2
रामाज्ञा प्रश्न पंचम सर्ग सप्तक 1 श्लोक 2 — अगम्य समुद्र और लंका के सामने वानरों की दुविधा; यह प्रश्न-फल निकृष्ट है।
॥रामाज्ञा प्रश्न॥ में तुलसीदास जी ने रामकथा के प्रसंगों को ऐसे दोहों में ढाला है कि हर दोहा प्रश्नकर्ता को सीधा संकेत दे जाता है। यह पहले सप्तक का दूसरा दोहा है। पंचम सर्ग हनुमानजी के समुद्र-लंघन से लेकर रावण-वध तक के पराक्रम का सर्ग है।
समुद्र और लंका के सामने वानरों की दुविधा — यह प्रश्न-फल निकृष्ट है।
मूल दोहा: जलधि पार मानस अगम रावन पालित लंक। सोच बिकल कपि भालु सब, दुहुँ दिसि संकट संक॥२॥
शब्दार्थ:
- जलधि पार = समुद्र के पार
- मानस अगम = मन से भी अगम्य
- रावन पालित = रावण द्वारा पालित
- सोच बिकल = चिंता से व्याकुल
- कपि भालु = वानर और भालू
- दुहुँ दिसि = दोनों ओर
- संकट संक = विपत्ति और शंका
जलधि पार मानस अगम = समुद्र के पार, मन से भी अगम्य। दुहुँ दिसि संकट संक = दोनों ओर शंका और विपत्ति है।
भावार्थ / व्याख्या:
समुद्र के पार मन से भी अगम्य, रावण द्वारा पालित लंका नगरी है। सारे वानर-भालू इस चिंता से व्याकुल हो रहे हैं कि दोनों ओर — समुद्र पार होने में और बिना कार्य पूरा किए लौटने में — शंका और विपत्ति है।
यह वह स्थिति है जिसे लोकभाषा में ‘आगे कुआँ, पीछे खाई’ कहते हैं। न आगे बढ़ सकते हैं, न पीछे लौट सकते हैं।
तुलसीदास जी इस प्रश्न-फल को ‘निकृष्ट’ कहते हैं। शकुन की दृष्टि से यह दोहा उन प्रश्नों में चेतावनी देता है जहाँ हर विकल्प कठिन लग रहा हो। परंतु स्मरण रहे — इसी स्थिति से आगे चलकर हनुमानजी ने समुद्र लाँघा। मार्ग निकलता है, पर तत्काल नहीं।
शकुन फल:
यह प्रश्न-फल निकृष्ट है। निम्नलिखित प्रश्नों में विशेष सावधानी:
- ऐसी स्थिति जहाँ हर विकल्प कठिन लगे
- न आगे बढ़ पाना, न पीछे हट पाना
- बहुत बड़ी बाधा या असंभव लगती चुनौती
- समूह में फैली निराशा और असमंजस
- जोखिम भरा कदम उठाने का दबाव
इस दोहे के आने पर प्रश्न-फल निकृष्ट है। तत्काल कोई निर्णय न लें। यह ठहरकर नई रणनीति बनाने का समय है — जल्दबाज़ी में उठाया कदम भारी पड़ेगा।
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