रामाज्ञा प्रश्न / चतुर्थ सर्ग / सप्तक 7 / श्लोक 2
रामाज्ञा प्रश्न चतुर्थ सर्ग सप्तक 7 श्लोक 2 — राजसभा में शिव-धनुष भंग और चारों ओर जय-जयकार; सफलतादायक और परम कल्याणकारी शकुन।
॥रामाज्ञा प्रश्न॥ में तुलसीदास जी ने रामकथा के प्रसंगों को ऐसे दोहों में ढाला है कि हर दोहा प्रश्नकर्ता को सीधा संकेत दे जाता है। चतुर्थ सर्ग, सातवें सप्तक और उसमें दूसरा दोहा — इस सर्ग के अधिकांश शकुन अनुकूल और आनंददायक माने गए हैं।
धनुष-भंग और चारों ओर जयकार — सफलतादायक और परम कल्याणकारी।
मूल दोहा: भूप सभाँ भव चाप दलि राजत राजकिसोर। सिद्धि सुमंगल सगुन सुभ जय जय जय सब ओर॥२॥
शब्दार्थ:
- भूप सभाँ = राजाओं की सभा में
- भव चाप = शिवजी का धनुष
- दलि = तोड़कर
- राजत = शोभित हो रहे हैं
- राजकिसोर = राजकुमार
- सिद्धि = सफलता
- सुमंगल = परम कल्याण
- जय जय जय = जय-जयकार
- सब ओर = चारों ओर
भूप सभाँ भव चाप दलि राजत राजकिसोर = राजाओं की सभा में शिव-धनुष तोड़कर राजकुमार शोभित हैं। जय जय जय सब ओर = चारों ओर जय-जयकार हो रही है।
भावार्थ / व्याख्या:
राजाओं की सभा में शंकरजी के धनुष को तोड़कर अयोध्या के राजकुमार श्रीराम शोभित हो रहे हैं और सब ओर उनकी जय-जयकार हो रही है।
यह वह क्षण था जब अनेक बलशाली राजा असफल हो चुके थे और एक किशोर ने वह कर दिखाया जो कोई न कर सका।
तुलसीदास जी कहते हैं कि यह शुभ शकुन सफलतादायक एवं परम कल्याणकारी है। शकुन की दृष्टि से यह दोहा उन प्रश्नों में सर्वाधिक अनुकूल है जहाँ किसी कठिन परीक्षा, प्रतियोगिता या चुनौती में सफलता विषय हो।
शकुन फल:
यह शुभ शकुन सफलतादायक और परम कल्याणकारी है। निम्नलिखित प्रश्नों में:
- कठिन परीक्षा, प्रतियोगिता या चुनौती
- जहाँ अनेक लोग असफल हो चुके हों
- सार्वजनिक मंच पर योग्यता सिद्ध करना
- विवाह संबंधी निर्णायक क्षण
- बड़ी सफलता और सर्वत्र प्रशंसा
इस दोहे के आने पर सफलता और परम कल्याण का संकेत है। जहाँ दूसरे असफल हुए हैं, वहाँ आप सफल होंगे — चारों ओर से प्रशंसा मिलेगी।
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