रामाज्ञा प्रश्न / चतुर्थ सर्ग / सप्तक 6 / श्लोक 7
रामाज्ञा प्रश्न चतुर्थ सर्ग सप्तक 6 श्लोक 7 — जनकजी का सम्मानपूर्वक राजभवन में स्वागत और प्रेमपूर्ण पूजन; भाग्य में बड़ाई का शुभ शकुन।
॥रामाज्ञा प्रश्न॥ पढ़ते समय दोहे का अर्थ और उसका शकुन-फल — दोनों को साथ रखकर विचार करना उचित माना गया है। इस छठे सप्तक के सातवाँ दोहे में चतुर्थ सर्ग की वही शुभ धारा है जो हर मनोरथ की पूर्ति का भरोसा देती है।
सप्तक का समापन — भाग्य में बहुत बड़ाई है।
मूल दोहा: सनमाने आने सदन पूजे अति अनुराग। तुलसी मंगल सगुन सुभ भूरि भलाई भाग॥७॥
शब्दार्थ:
- सनमाने = सम्मानपूर्वक
- आने सदन = भवन में ले आए
- पूजे = पूजा की
- अति अनुराग = अत्यंत प्रेम से
- मंगल सगुन सुभ = शुभ मंगलकारी शकुन
- भूरि = बहुत अधिक
- भलाई = बड़ाई, भलाई
- भाग = भाग्य
सनमाने आने सदन पूजे अति अनुराग = सम्मानपूर्वक भवन में लाकर अत्यंत प्रेम से पूजा की। भूरि भलाई भाग = भाग्य में बहुत अधिक बड़ाई है।
भावार्थ / व्याख्या:
महाराज जनक श्रीराम-लक्ष्मण सहित विश्वामित्रजी को सम्मानपूर्वक राजभवन में ले आए और अत्यंत प्रेमपूर्वक उनकी पूजा की।
तुलसीदास जी कहते हैं कि यह शुभ शकुन मंगलकारी है और भाग्य में बहुत अधिक बड़ाई है।
‘भूरि भलाई भाग’ अर्थात् भाग्य में प्रचुर मात्रा में बड़ाई और भलाई लिखी है। शकुन की दृष्टि से यह दोहा उन प्रश्नों में विशेष अनुकूल है जहाँ प्रतिष्ठा, सम्मान और भाग्योदय विषय हो। यह बताता है कि आने वाला समय आपके लिए सम्मान और प्रगति लेकर आएगा।
शकुन फल:
यह शुभ शकुन मंगलकारी है और भाग्य में बड़ाई का सूचक है। निम्नलिखित प्रश्नों में:
- प्रतिष्ठा, सम्मान और सामाजिक स्थान
- भाग्योदय और उन्नति का समय
- किसी का आदरपूर्ण स्वागत या सत्कार
- प्रेम और सद्भाव से बनने वाले संबंध
- आने वाले समय की अनुकूलता
इस दोहे के आने पर शकुन मंगलकारी है। भाग्य में प्रचुर बड़ाई लिखी है — सम्मान और प्रगति दोनों मिलेंगे।
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