रामाज्ञा प्रश्न / चतुर्थ सर्ग / सप्तक 6 / श्लोक 6
रामाज्ञा प्रश्न चतुर्थ सर्ग सप्तक 6 श्लोक 6 — जनकजी का अतिथि-पूजन और कुमारों को देख नगरवासियों का आनंद; शुभ प्रश्न-फल।
तुलसीदास जी की यह कृति प्रश्न और उत्तर की उस प्राचीन पद्धति को जीवित रखती है जिसमें रामकथा ही प्रमाण है। इस छठे सप्तक के छठा दोहे में चतुर्थ सर्ग की वही शुभ धारा है जो हर मनोरथ की पूर्ति का भरोसा देती है।
जनकजी का अतिथि-पूजन — प्रश्न-फल शुभ है।
मूल दोहा: जनक पाइ प्रिय पाहुने पूजे पूजन जोग। बालक कोसलपाल के देखि मगन पुर लोग॥६॥
शब्दार्थ:
- जनक = महाराज जनक
- पाइ = पाकर
- प्रिय पाहुने = प्रिय अतिथि
- पूजे = पूजन किया
- पूजन जोग = पूजा करने योग्य
- बालक = कुमार
- कोसलपाल = कोसलनरेश
- मगन = आनंदमग्न
- पुर लोग = नगरवासी
जनक पाइ प्रिय पाहुने पूजे पूजन जोग = जनकजी ने पूजा योग्य प्रिय अतिथियों को पाकर उनका पूजन किया। देखि मगन पुर लोग = कुमारों को देखकर नगरवासी आनंदमग्न हैं।
भावार्थ / व्याख्या:
महाराज जनक ने पूजा करने योग्य प्रिय अतिथियों को पाकर उनका पूजन किया। कोसलनरेश महाराज दशरथ के कुमारों को देखकर नगरवासी आनंदमग्न हो रहे हैं।
इस दोहे में अतिथि-सत्कार की भारतीय परंपरा दिखाई देती है। जनकजी स्वयं एक महान राजा और ज्ञानी थे, फिर भी उन्होंने अतिथियों का पूजन किया।
तुलसीदास जी इस प्रश्न-फल को शुभ कहते हैं। शकुन की दृष्टि से यह दोहा उन प्रश्नों में अनुकूल है जहाँ अतिथि का आगमन, किसी नए स्थान पर स्वागत या सामाजिक स्वीकृति विषय हो।
शकुन फल:
यह प्रश्न-फल शुभ है। निम्नलिखित प्रश्नों में परिणाम अनुकूल रहेगा:
- अतिथि का आगमन या आतिथ्य सत्कार
- नए स्थान पर जाने पर मिलने वाला स्वागत
- सामाजिक स्वीकृति और लोकप्रियता
- किसी बड़े व्यक्ति से आदरपूर्ण भेंट
- पहली मुलाकात या परिचय का अवसर
इस दोहे के आने पर प्रश्न-फल शुभ है। जहाँ जा रहे हैं वहाँ आदर और स्वागत मिलेगा। पहली छाप अच्छी पड़ेगी।
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