रामाज्ञा प्रश्न / चतुर्थ सर्ग / सप्तक 2 / श्लोक 7
रामाज्ञा प्रश्न चतुर्थ सर्ग सप्तक 2 श्लोक 7 — संसार-सागर के रत्नस्वरूप पुत्रों की प्राप्ति; पुत्र-लाभ के लिए शुभ शकुन।
॥रामाज्ञा प्रश्न॥ पढ़ते समय दोहे का अर्थ और उसका शकुन-फल — दोनों को साथ रखकर विचार करना उचित माना गया है। प्रस्तुत दोहा चतुर्थ सर्ग के दूसरे सप्तक में सातवाँ स्थान पर है, जहाँ संतान, यज्ञ और शुभ मुहूर्त के संकेत मिलते हैं।
सप्तक का समापन — पुत्र-प्राप्ति के लिए शुभ शकुन।
मूल दोहा: लहे मातु पितु भाग बस सुत जग जलधि ललाम। पुत्र लाभ हित सगुन सुभ, तुलसी सुमिरहु राम॥७॥
शब्दार्थ:
- लहे = पाए
- मातु पितु = माता-पिता
- भाग = सौभाग्यवश
- सुत = पुत्र
- जग जलधि = संसार-सागर
- ललाम = रत्न, आभूषण
- पुत्र लाभ हित = पुत्र-प्राप्ति के लिए
- सुमिरहु = स्मरण करो
सुत जग जलधि ललाम = संसार-सागर में रत्नस्वरूप पुत्र। पुत्र लाभ हित सगुन सुभ = यह शकुन पुत्र-प्राप्ति के लिए शुभ है।
भावार्थ / व्याख्या:
माता-पिता ने सौभाग्यवश संसार-सागर में रत्नस्वरूप पुत्र पाए। तुलसीदास जी कहते हैं कि श्रीराम का स्मरण करो — यह शकुन पुत्र-प्राप्ति के लिए शुभ है।
‘जग जलधि ललाम’ अर्थात् संसार रूपी समुद्र का रत्न। समुद्र मंथन से जैसे रत्न निकले थे, वैसे ही संतान संसार का सबसे मूल्यवान रत्न है।
शकुन की दृष्टि से यह दोहा संतान-प्राप्ति संबंधी प्रश्नों में स्पष्ट शुभ उत्तर देता है। साथ ही ‘भाग बस’ शब्द यह भी बताता है कि यह सौभाग्य का विषय है — इसलिए धैर्य और श्रद्धा बनाए रखना आवश्यक है।
शकुन फल:
यह शकुन पुत्र-प्राप्ति के लिए शुभ है। निम्नलिखित प्रश्नों में:
- संतान प्राप्ति, विशेषकर पुत्र-लाभ
- संतान के लिए किया जा रहा उपाय या उपचार
- परिवार में नए सदस्य का आगमन
- किसी मूल्यवान वस्तु या अवसर की प्राप्ति
- सौभाग्य और भाग्योदय से जुड़ा प्रश्न
इस दोहे के आने पर पुत्र-प्राप्ति के लिए शुभ संकेत है। श्रीराम का स्मरण करते रहें — जो प्रतीक्षा है वह पूरी होगी।
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