रामाज्ञा प्रश्न / चतुर्थ सर्ग / सप्तक 2 / श्लोक 6
रामाज्ञा प्रश्न चतुर्थ सर्ग सप्तक 2 श्लोक 6 — राजभवन के आँगन में बालकों की क्रीड़ा; सुमंगलों की माला कहा गया शुभ शकुन।
तुलसीदास जी की यह कृति प्रश्न और उत्तर की उस प्राचीन पद्धति को जीवित रखती है जिसमें रामकथा ही प्रमाण है। प्रस्तुत दोहा चतुर्थ सर्ग के दूसरे सप्तक में छठा स्थान पर है, जहाँ संतान, यज्ञ और शुभ मुहूर्त के संकेत मिलते हैं।
राजभवन के आँगन में बालकों की क्रीड़ा — मंगलों की माला।
मूल दोहा: राज अजिर राजत रुचिर कोसल पालक बाल। जानु पानि चर चरित बर सगुन सुमंगल माल॥६॥
शब्दार्थ:
- राज अजिर = राजभवन का आँगन
- राजत = सुशोभित
- रुचिर = सुंदर
- कोसल पालक = कोसलनरेश
- बाल = बालक
- जानु पानि = घुटनों और हाथों के बल
- चर = चलते हुए
- चरित बर = सुंदर चरित, क्रीड़ा
- सुमंगल माल = मंगलों की माला
जानु पानि चर चरित बर = घुटनों और हाथों के बल चलते और सुंदर क्रीड़ा करते हैं। सगुन सुमंगल माल = यह शकुन मंगलों की माला है।
भावार्थ / व्याख्या:
राजभवन के आँगन में कोसलनरेश महाराज दशरथ के सुंदर बालक घुटनों तथा हाथों के बल चलते एवं सुंदर क्रीड़ा करते सुशोभित होते हैं।
तुलसीदास जी इस शकुन को ‘सुमंगलों की माला’ कहते हैं। माला में एक मनका नहीं, अनेक होते हैं और सब एक सूत्र में पिरोए रहते हैं।
अर्थात् यह शकुन एक मंगल नहीं, मंगलों की शृंखला का संकेत देता है। शकुन की दृष्टि से यह दोहा उन प्रश्नों में विशेष शुभ है जहाँ किसी कार्य के आरंभिक चरण की बात हो — जैसे बालक अभी घुटनों के बल चल रहा है, पर आगे दौड़ेगा।
शकुन फल:
यह शकुन सुमंगलों की माला है। निम्नलिखित प्रश्नों में परिणाम अनुकूल रहेगा:
- किसी कार्य का आरंभिक चरण
- छोटे बच्चों से जुड़ा कोई प्रश्न
- घर-आँगन और पारिवारिक सुख
- धीरे-धीरे बढ़ने वाली प्रगति
- लगातार शुभ अवसरों की शृंखला
इस दोहे के आने पर सुमंगलों की माला का संकेत है। आरंभ छोटा लग सकता है, पर आगे बढ़ेगा। एक के बाद एक शुभ अवसर आएँगे।
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