रामाज्ञा प्रश्न / तृतीय सर्ग / सप्तक 6 / श्लोक 5
रामाज्ञा प्रश्न तृतीय सर्ग सप्तक 6 श्लोक 5 — सुग्रीव का क्रोध और वानरों को समय-सीमा की कठोर चेतावनी; यह प्रश्न-फल अनिष्ट है।
जब मन किसी दुविधा में हो, तब ॥रामाज्ञा प्रश्न॥ का एक दोहा भी दिशा दिखाने के लिए पर्याप्त माना गया है। इस छठे सप्तक के पाँचवाँ दोहे में तृतीय सर्ग का वह भाव है जहाँ मार्ग कठिन होने पर भी सहायक मिल ही जाते हैं।
सुग्रीव का क्रोध और चेतावनी — यह प्रश्न-फल अनिष्ट है।
मूल दोहा: डाँटे बानर भालु सब अवधि गये बिन काज। जो आइहि सो काल बस कोपि कहा कपिराज॥५॥
शब्दार्थ:
- डाँटे = डाँटा
- बानर भालु = वानर और भालू
- अवधि = निश्चित समय
- गये बिन काज = बिना कार्य किए गए
- जो आइहि = जो आएगा
- काल बस = काल का शिकार
- कोपि = क्रोध करके
- कपिराज = वानरराज सुग्रीव
अवधि गये बिन काज = समय बीत जाने पर कार्य किए बिना। जो आइहि सो काल बस = जो आएगा वह काल का शिकार होगा।
भावार्थ / व्याख्या:
कपिराज सुग्रीव ने क्रोध करके सब वानर-भालुओं को डाँटते हुए कहा कि निश्चित समय बीत जाने पर जो कार्य किए बिना लौटेगा, वह मारा जाएगा।
यह कठोर चेतावनी थी, परंतु इसी दबाव ने वानरों को समुद्र तक पहुँचाया और अंततः हनुमानजी की लंका-यात्रा का कारण बनी।
शकुन की दृष्टि से यह दोहा अनिष्ट सूचक है। यह उस स्थिति का संकेत देता है जहाँ समय-सीमा का भारी दबाव हो और असफलता के गंभीर परिणाम हों। ऐसे समय में घबराहट में काम बिगड़ सकता है — इसलिए योजना बनाकर, शांत मन से कार्य करना आवश्यक है।
शकुन फल:
यह प्रश्न-फल अनिष्ट है। निम्नलिखित प्रश्नों में विशेष सावधानी:
- कड़ी समय-सीमा वाला कोई कार्य
- असफल होने पर गंभीर परिणाम की आशंका
- किसी वरिष्ठ या मालिक की नाराज़गी
- दबाव या धमकी की स्थिति
- समय बीत जाने के बाद की जा रही कार्रवाई
इस दोहे के आने पर प्रश्न-फल अनिष्ट है। दबाव अधिक है, पर घबराहट में काम और बिगड़ेगा। शांत रहकर योजना बनाएँ और समय-सीमा को गंभीरता से लें।
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