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रामाज्ञा प्रश्न / तृतीय सर्ग / सप्तक 6 / श्लोक 6

रामाज्ञा प्रश्न तृतीय सर्ग सप्तक 6 श्लोक 6 — प्रभु द्वारा बल-बुद्धि निधान हनुमानजी को मुद्रिका देना; विश्वास और उत्तरदायित्व का शुभ शकुन।

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तुलसीदास जी की यह कृति प्रश्न और उत्तर की उस प्राचीन पद्धति को जीवित रखती है जिसमें रामकथा ही प्रमाण है। इस छठे सप्तक के छठा दोहे में तृतीय सर्ग का वह भाव है जहाँ मार्ग कठिन होने पर भी सहायक मिल ही जाते हैं।

प्रभु द्वारा हनुमानजी को अँगूठी देना — यह प्रश्न-फल शुभ है।

मूल दोहा: जान सिरोमनि जानि जियँ कपि बल बुद्धि निधानु। दीन्हि मुद्रिका मुदित प्रभु, पाइ मुदित हनुमानु॥६॥

शब्दार्थ:

  • जान सिरोमनि = ज्ञानियों में शिरोमणि
  • जानि जियँ = हृदय में जानकर
  • कपि = हनुमानजी
  • बल बुद्धि निधानु = बल और बुद्धि का खजाना
  • दीन्हि मुद्रिका = अँगूठी दी
  • मुदित = प्रसन्न
  • पाइ = पाकर

कपि बल बुद्धि निधानु = हनुमानजी बल और बुद्धि के भंडार हैं। दीन्हि मुद्रिका मुदित प्रभु = प्रसन्न होकर प्रभु ने अँगूठी दी।

भावार्थ / व्याख्या:

प्रभु ने हृदय में हनुमानजी को ज्ञानियों में शिरोमणि तथा बल-बुद्धि का निधान जानकर, प्रसन्न होकर अपनी अँगूठी दी। उसे पाकर हनुमानजी प्रसन्न हुए।

अँगूठी देना केवल एक वस्तु देना नहीं था — वह विश्वास का प्रतीक था। श्रीराम ने अपनी सबसे व्यक्तिगत पहचान उन्हें सौंपी, और वही अँगूठी अशोक वाटिका में सीताजी के लिए प्रमाण बनी।

शकुन की दृष्टि से यह दोहा शुभ है। यह उन प्रश्नों में विशेष अनुकूल है जहाँ किसी बड़े उत्तरदायित्व, विशेष अधिकार या विश्वास का हस्तांतरण विषय हो। यह बताता है कि आपकी योग्यता पहचानी गई है और आपको महत्वपूर्ण ज़िम्मेदारी मिलेगी।

शकुन फल:

यह प्रश्न-फल शुभ है। निम्नलिखित प्रश्नों में परिणाम अनुकूल रहेगा:

  • कोई विशेष उत्तरदायित्व या अधिकार मिलना
  • अपनी योग्यता की पहचान और मान्यता
  • किसी बड़े व्यक्ति का विश्वास प्राप्त करना
  • महत्वपूर्ण दस्तावेज़, अधिकार-पत्र या प्रमाण
  • अँगूठी, आभूषण या मूल्यवान वस्तु का लेन-देन

इस दोहे के आने पर प्रश्न-फल शुभ है। आपकी योग्यता पहचानी जाएगी और महत्वपूर्ण ज़िम्मेदारी मिलेगी। उस विश्वास को निभाएँ — वही आपकी सबसे बड़ी पूँजी है।

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